हमारे कार्यक्रम

सीएसआईआर-भारतीय विषविज्ञान अनुसंधान संस्थान में पर्यावरण दिवस समारोह मनाया गया इस  अवसर पर  भारत के वरिष्ठ एवं प्रतिष्ठित वैज्ञानिक एकत्र हुए । शहर स्थित  सीएसआईआर-भारतीय विषविज्ञान अनुसंधान संस्थान में विज्ञान और प्रौद्योगिकी का उल्लेखनीय यथार्थ मिश्रण पर्यावरण दिवस समारोह में दिखा । संस्थान के निदेशक प्रोफ़ेसर  आलोक धावन ने कहा कि पद्मश्री प्रोफेसर डी. बालासुब्रामनियन, पूर्व निदेशक, सीएसआईआर- कोशिकीय एवं आणविक जीवविज्ञान केंद्र, (सीसीएमबी) हैदराबाद एवं प्रतिष्ठित वैज्ञानिक, एल.वी. प्रसाद नेत्र संस्थान,  हैदराबाद और पद्मश्री डॉ. नित्या आनंद, पूर्व निदेशक, सीएसआईआर-केंद्रीय औषधि अनुसंधान संस्थान (सीडीआरआई), लखनऊ की इस अवसर पर उपस्थिति,  मौलिक विज्ञान को मूर्त मानव लाभ में परिवर्तित करने के लिए संस्थान की प्रतिबद्धता को दर्शाती है। इस अवसर पर  सीएसआईआर-आईआईटीआर के अनेक पूर्व एवं वर्तमान वैज्ञानिक और कर्मचारी तथा शोध छात्र उपस्थित थे।

प्रोफेसर डी. बालासुब्रामनियन ने सभी से अनुरोध किया कि हरित बनाने और पर्यावरण के संरक्षण के  लिए वैकल्पिक ईंधन के संसाधनों का उपयोग करें ।

पद्मश्री प्रोफेसर डी. बालासुब्रामनियन ने इस अवसर  पर 21वॉं डॉ. सी.आर. कृष्णाुमूर्ति व्याूख्यान दिया। ग्लोबल वार्मिंग पर प्रकाश डालते हुए, उन्होंने जीवाश्म ईंधनों (फॉसिल फ़्यूल्स ) को त्यागने की आवश्यकता पर बल दिया, ताकि भावी विश्व स्वच्छ सुंदर हो और पर्यावरण को संजोए रखा जा सके । प्रोफेसर डी. बालासुब्रामनियन ने कहा कि इस समय नितांत आवश्यक है कि सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, ज्वारीय ऊर्जा और माइक्रोबियल ईंधन कोशिकाओं से बायोइलेक्ट्रीसिटी जैसे वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों का उपयोग करके पर्यावरण के अनुकूल रहें ।

समारोह की अध्योक्षता डॉ. नित्याो आनन्दि, पूर्व निदेशक, सीएसआईआर-केंद्रीय औषधि अनुसंधान संस्थान(सीडीआरआई), लखनऊ ने की।  उन्होंने अपने सम्बोधन में कहा कि पर्यावरण सबसे पवित्र वस्तु है, जिससे जीवन का अस्तित्व सुविधाजनक बनता है और इसलिए इसे संरक्षित करने की आवश्यकता है। उन्होंने सुझाव दिया कि स्कूलों और कॉलेजों को पर्यावरण विज्ञान पर एक नियमित  पाठ्यक्रम रखना चाहिए। उन्होंने सभी से वातावरण को सुरक्षित बनाने के लिए कार्य करने हेतु प्रतिज्ञा  करने के लिए भी अनुरोध किया।

संस्थान के पर्यावरण निगरानी विभाग द्वारा तैयार की गई एक रिपोर्ट, "प्री मानसून, 2017 के दौरान लखनऊ शहर के परिवेश वायु गुणवत्ता का आंकलन", इस अवसर पर जारी की  गई । इस रिपोर्ट का विवरण संस्थान की वेबसाइट पर उपलब्ध है।

इसी क्रम में सीएसआईआर-आईआईटीआर ने दो आयु समूहों में स्कूल के छात्रों के लिए एक पेंटिंग प्रतियोगिता आयोजित  की गई,  जिसके विजयी प्रतिभागियों को  इस अवसर पर पुरस्कारों का वितरण किया गया। ई. ए.एच. खान, प्रधान  वैज्ञानिक, सीएसआईआर-आईआईटीआर एवं  समारोह के संयोजक के  धन्यवाद ज्ञापन के  साथ कार्यक्रम संपन्न हुआ ।

देश के प्रमुख विषविज्ञान संस्थान, सीएसआईआर-भारतीय विषविज्ञान अनुसंधान संस्थान में नवंबर 4,  2017 को 52वां वार्षिक दिवस मनाया गया। इस समारोह के मुख्य अतिथि प्रोफेसर अरुण तिवारी, पूर्व मिसाइल वैज्ञानिक और लेखक थे, जिसकी अध्यक्षता पद्मश्री डॉ॰ नित्या आनंद, पूर्व निदेशक, सीएसआईआर-सीडीआरआई ने की। संस्थान के निदेशक प्रोफेसर आलोक धावन ने अतिथियों का स्वागत किया और वर्ष 2016-2017 के लिए संस्थान की वार्षिक रिपोर्ट प्रस्तुत की। उन्होंने इस काल में संस्थान के कई उल्लेखनीय योगदानों का वर्णन किया और कहा कि संस्थान का वार्षिक दिवस एक उपयुक्त अवसर होता है जब सभी कर्मचारी संस्थान के मिशन को प्राप्त करने के लिए पूर्व में निर्धारित लक्ष्यों को पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध होते हैं और भविष्य के लिए नए आयाम निर्धारित करते है। उन्होंने स्वच्छ भारत, स्वस्थ भारत, कौशल भारत, नमामी गंगे आदि जैसे राष्ट्रीय मिशन कार्यक्रमों के लिए संस्थान की प्रतिबद्धता को दोहराया और कहा कि संस्थान डिजिटल इंडिया कार्यक्रम के साथ समन्वय में डिजिटल प्रारूप में अपनी वार्षिक रिपोर्ट जारी कर रहा है।

सीएसआईआर-आईआईटीआर के मुख्य वैज्ञानिक और आयोजन समिति के अध्यक्ष डॉ॰ डी॰ कार चौधरी ने मुख्य अतिथियों का परिचय दिया। 

वार्षिक दिन व्याख्यान प्रस्तुत करते हुए, प्रोफेसर अरुण तिवारी ने कहा कि देश के समस्त विकास में बाधा "है" और "नहीं है" के बीच चौड़ा अंतर है। उन्होंने सुझाव दिया कि व्यक्तियों द्वारा सामाजिक दायित्व में वृद्धि इस खाई को पाटने का सबसे अच्छा तरीका है।

पद्मश्री डॉ॰ नित्या आनंद ने अध्यक्षीय भाषण दिया और सीएसआईआर-आईआईटीआर परिवार को अपनी उपलब्धियों पर बधाई दी, साथ ही साथ आग्रह किया कि वह पिछली उपलब्धियों पर ही संतोष न  करें। उन्होंने वैज्ञानिकों को राष्ट्र के संस्थापकों के सपनों को पूरा करने के लिए काम करने का आग्रह किया।

इस अवसर पर, सीआईएसआईआर-आईआईटीआर की वार्षिक रिपोर्ट (हिंदी और अंग्रेजी), प्रिंट मीडिया में सीएसआईआर-आईआईटीआर का एक संकलन, CITAR सुविधा (सेंटर फार इनोवेशन एंड  ट्रांसलेशनल रिसर्च) पर एक ब्रोशर, नैनोटॉक्सिकोलॉजी पर एक पुस्तक और वर्ष 2018 के लिए संस्थान का कैलेंडर भी जारी किया गया। सीएसआईआर-आईआईटीआर परिवार के कई सदस्यों को उनकी प्रतिष्ठित सेवा संस्थान के लिए सम्मानित किया गया। 

डॉ॰ देवेंद्र परमार, मुख्य वैज्ञानिक ने धन्यवाद प्रस्ताव दिया। इस समारोह का समापन संस्थान के शोध छात्रों द्वारा एक सांस्कृतिक कार्यक्रम के साथ संपन्न हुआ

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सीएसआईआर-भारतीय विषविज्ञान अनुसंधान संस्‍थान में हिंदी सप्‍ताह 2017 के उद्घाटन समारोह का आयोजन

सीएसआईआर-भारतीय विषविज्ञान अनुसंधान संस्थान, लखनऊ में आज दिनांक 14 सितंबर, 2017 को प्रातः 10:30 बजे एस.एच. जैदी सभागार में हिंदी सप्ताह के उद्घाटन समारोह का आयोजन किया गया। श्री चंद्र मोहन तिवारी, हिंदी अधिकारी, सीएसआईआर-आईआईटीआर ने अतिथिगण का परिचय दिया। समारोह के मुख्य अतिथि श्री पीयूष वर्मा, क्षेत्रीय पासपोर्ट अधिकारी, लखनऊ एवं विशिष्ट अतिथि डॉ. अनिल रस्तोगी, वैज्ञानिक एवं फिल्म कलाकार थे। इस अवसर पर मुख्य अतिथि श्री पीयूष वर्मा ने अपने संबोधन में कहा कि केवल हिंदी दिवस को नहीं संपूर्ण वर्ष इसी चेतना एवं संकल्प से हिंदी में अधिक से अधिक कार्य करें। हमें अपनी भाषा पर गर्व करना चाहिए। सरल भाषा का प्रयोग करते हुए विज्ञान की छोटी–छोटी पुस्तके हिंदी भाषा में लिखना चाहिए। भाषा को रोज़गार से जोड़ना चाहिए। हम सभी को हिंदी भाषा के विकास के लिए संकल्प लेना चाहिए। उन्होंने संस्थान की राजभाषा पत्रिका एवं हिंदी में किए जा रहे अन्य कार्यों की सराहना भी किया।

विशिष्ट अतिथि, डॉ. अनिल रस्तोगी ने अपने संबोधन में कहा कि हिंदी भाषा केवल भारत में ही नहीं अपितु अनेक देशों में बोली जाती है। उन्होंने भारत सरकार की विभिन्न हिंदी प्रोत्साहन योजनाओं तथा हिंदी भाषा में कार्य करने हेतु उपलब्ध डिजिटल टूल्स पर विस्तृत प्रकाश डालते हुए कहा कि हमें अपनी भाषा को बढ़ावा देने के लिए और गंभीर प्रयास करने चाहिए, हिंदी में सोचें, हिंदी में लिखें और हिंदी में ही बोलें। 

समारोह की अध्यक्षता संस्थान के निदेशक, प्रोफेसर आलोक धावन ने किया। उन्होंने अपने अध्यक्षीय संबोधन में कहा कि विज्ञान को आगे ले जाने हेतु भाषा एक सशक्त माध्यम है। किसी देश की उन्नति उसकी भाषा और संस्कृति से होती है। हिंदी भाषा बहुत समृद्ध भाषा है, इसका शब्द भंडार बहुत विशाल है, वैज्ञानिक और तकनीकी कार्य इसमें आसानी से किए जा सकते हैं। हमारा संस्थान इसमें अग्रसर है, अनेक शोध पत्र, वैज्ञानिक लेख हिंदी में लिखे जा रहे हैं। वर्ष 2016 में हिंदी में राष्ट्रीय वैज्ञानिक संगोष्ठी का सफलता पूर्वक आयोजन किया गया था और इस वर्ष 11–13 अक्टूबर, 2017 को अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक संगोष्ठी होने जा रही है । हिंदी सप्ताह के दौरान हमें विचार करना चाहिए कि कैसे हम अपनी राजभाषा हिंदी को और आगे ले जा सकते हैं और पूरे वर्ष कैसे अधिक से अधिक इसका प्रयोग कर सकते हैं। हम अपनी राजभाषा को कैसे आगे ले जाएं, यह सोच हम सभी के अंदर होनी चाहिए। 

संस्थान के प्रशासन नियंत्रक, श्री अनिल कुमार ने बताया कि हिंदी सप्ताएह के दौरान अनेक प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जाता है। इसमें वैज्ञानिक, तकनीकी एवं प्रशासनिक अधिकारी/कर्मचारी/शोध-छात्र बढ़-चढ़कर भाग लेते है। समारोह के अंत में उन्होंने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। समारोह का संचालन श्री चंद्र मोहन तिवारी, हिंदी अधिकारी, सीएसआईआर-आईआईटीआर ने किया।


हिंदी सप्ताह 2017 के पुरस्‍कार वितरण एवं समापन समारोह का आयोजन

सीएसआईआर-भारतीय विषविज्ञान अनुसंधान संस्थान, लखनऊ में दिनांक 20 सितंबर, 2017 को एस.एच. जैदी सभागार में हिंदी सप्ताह के पुरस्कार वितरण समारोह का आयोजन किया गया। समारोह के संयोजक, श्री चंद्र मोहन तिवारी, हिंदी अधिकारी, सीएसआईआर-आईआईटीआर ने मुख्य अतिथि, पद्मश्री प्रोफ़ेसर प्रमोद टंडन, सी.ई.ओ. बायोटेक पार्क, लखनऊ का स्वागत किया। समारोह की अध्यक्षता संस्थान के निदेशक, प्रोफ़ेसर आलोक धावन ने किया। मुख्य अतिथि महोदय ने अपने संबोधन में कहा कि हिंदी से जुड़े कार्यक्रम में आकर हमें अपार प्रसन्नता होती है। हिंदी में वैज्ञानिक कार्य करने वाले संस्थान कम हैं, किंतु सीएसआईआर-आईआईटीआर में वैज्ञानिक एवं तकनीकी कार्य हिंदी में काफी किए जा रहे हैं, यह प्रसन्नता की बात है। शोध पत्र हिंदी में लिखे जा रहे हैं, यह बहुत अच्छी बात है, परंतु मैं वैज्ञानिकों और शोध छात्रों से आग्रह करता हूँ कि इस क्षेत्र में और परिश्रम करके अधिक से अधिक शोध पत्र हिंदी में प्रकाशित करें, जिससे कि आम जनता वैज्ञानिक उपलब्धियों का लाभ उठा सके। अनेक पुरस्कार प्राप्त संस्थान की राजभाषा पत्रिका ‘’विषविज्ञान संदेश’’ एक उल्लेखनीय प्रयास है, जो कि अति प्रसंशनीय है और यह हमारे लिए प्रेरणास्रोत है। इस संस्थान में जिस प्रकार हिंदी में कार्य किया जा रहा है, वह अपने आप में एक अनुकरणीय उदाहरण है। संबोधन के बाद मुख्य अतिथि ने 27 प्रतियोगिताओं के विजयी प्रतिभागियों को और निदेशक महोदय ने पिछले एक वर्ष में हिंदी में कार्य करने हेतु प्रोत्साहन योजना के अंतर्गत 11 नियमित स्टाफ को प्रमाणपत्र और पुरस्कार प्रदान किए। पुरस्कार के साथ-साथ हिंदी साहित्य की पुस्तकें भी प्रदान की गईं हैं। 

संस्थान के निदेशक, प्रोफेसर आलोक धावन ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में कहा कि विज्ञान को आगे ले जाने हेतु भाषा एक सशक्त माध्यम है। अंग्रेजी भाषा में शब्द सीमित हैं, वहीं हिंदी के पास विस्तृत शब्द भण्डार है, वैज्ञानिक और तकनीकी कार्य इसमें आसानी से किए जा सकते हैं। हम अपनी राजभाषा को कैसे आगे ले जाएं, यह सोच हम सभी के अंदर होनी चाहिए। संस्थान से छमाही राजभाषा पत्रिका ”विषविज्ञान संदेश" प्रकाशित की जा रही है और पर्यावरण और स्वास्थ्य से संबंधित पुस्तकें शीघ्र प्रकाशित की जाएंगी, जिससे आम जनता इनका लाभ उठा सके। हम वैज्ञानिक उपलब्धियों को आम जनता तक पहुंचाने के लिए अग्रसर हैं। 

समारोह के अंत में संस्थान के प्रशासन नियंत्रक, श्री अनिल कुमार ने धन्यवाद प्रस्ताव दिया।

पद्मश्री प्रोफेसर डी. बालासुब्रामनियन, पूर्व निदेशक, सीएसआईआर- कोशिकीय एवं आणविक जीवविज्ञान केंद्र,(सीसीएमबी) हैदराबाद एवं प्रतिष्ठित वैज्ञानिक, एल.वी. प्रसाद नेत्र संस्थान,  हैदराबाद ने 21वॉं डॉ. सी.आर. कृष्णािमूर्ति व्याशख्याएन दिया। ग्लोबल वार्मिंग पर प्रकाश डालते हुए, उन्होंने जीवाश्म ईंधनों (फॉसिल फ़्यूल्स ) को त्यागने की आवश्यकता पर बल दिया, ताकि भावी विश्व स्वच्छ सुंदर हो और पर्यावरण को संजोए रखा जा सके । प्रोफेसर डी. बालासुब्रामनियन ने कहा कि इस समय नितांत आवश्यक है कि सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, ज्वारीय ऊर्जा और  माइक्रोबियल ईंधन कोशिकाओं से बायोइलेक्ट्रीसिटी जैसे वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों का उपयोग करके पर्यावरण के अनुकूल रहें ।

सीएसआईआर-आईआईटीआर में 11 मई, 2016 को राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी दिवस का आयोजन किया गया। इस अवसर पर डॉ एसपीएस खनूजा, पूर्व निदेशक, सीएसआईआर-सीमैप और संस्थापक और संरक्षक स्काइस लाइफ टेक्नोलॉजीज प्राइवेट लिमिटेड को प्रौद्योगिकी दिवस व्याख्यान देने के लिए आमंत्रित किया गया। प्रोफेसर आलोक धवन, निदेशक, सीएसआईआर-आईआईटीआर ने बहुत ही गर्मजोशी से उनका स्वागत करते हुए इस दिन के महत्व पर जोर दिया और बताया कि क्यों यह दिन हर वर्ष  मनाया जाता है।

 

अपने व्याख्यान "रीचिंग द अनरीच्ड: इनोवेशन पाथ आफ साइंस” में डा खनूजा ने वनस्पति आनुवंशिकीविद् और आणविक जीवविज्ञानी से प्रारम्भ कर एक अन्वेषक और उद्यमी के रूप में अपनी यात्रा का वृतांत दर्शकों के समक्ष प्रस्तुत किया।  

 

डॉ खनूजा ने वैज्ञानिकों से प्रयोगशाला से उद्योग का पथ चुनने के बजाय उद्योग के लिए प्रयोगशाला का पथ चुनने के लिए आग्रह किया। उन्होंने कहा कि पौधे माध्यमिक चयापचयों का प्रयोग करके एक अनूठी व्यवस्था द्वारा आपस में संवाद करते हैं और हम वैज्ञानिक इन अणुओं का दोहन विभिन्न अनुप्रयोगों द्वारा समाज के लाभ के लिए कर सकते हैं।  उन्होंने 1996 में सीमैप में रहते हुए अपने स्वयं के उदाहरण का हवाला दिया जिससे मिंट में तेल की मात्रा में वृद्धि तथा बेहतर प्रक्रिया द्वारा भारत चीन से अग्रणी हो गया और कई किसानों के लिए आजीविका का साधन बना। उन्होंने एक और सफलता की कहानी आर्टीमिसिनिन का वर्णन किया जो एक मलेरिया रोधी दवा के रूप में 42 देशों को निर्यात किया जा रहा है। उन्होने बताया कि 2008 से एक उद्यमी के रूप में उच्च पोषक खाद्य पदार्थों का उत्पादन प्रारम्भ किया एवं जन मानस तक पहुंचाया। डॉ खनूजा ने श्रोताओं को बताया कि प्रौद्योगिकी व्यवहार्य बनाने के लिए तीन अत्यावश्यक चरण अर्थात नो-हाउ, शो-हाउ डू-हाउ आवश्यक हैं।

 

अपने व्याख्यान के समापन में डॉ खनूजा ने एक सफल उद्यमी बनने के लिए इच्छाशक्ति, कौशल और लक्ष्य पर बल दिया ।

 

डॉ डी कार चौधरी, मुख्य वैज्ञानिक ने धन्यवाद प्रस्ताव दिया।


जल से है जीवन, जीवन लाता है आशा और आशा कभी नहीं मरती ।

इस तथ्य को पद्म श्री चेवांग नोर्फेल द्वारा समझाया गया जो लद्दाख के "आइस मैन के नाम से  लोकप्रिय हैं। वह संस्थान में राष्ट्रीय विज्ञान दिवस समारोह के अंतर्गत एक लोकप्रिय विज्ञान व्याख्यान दे रहे थे। पद्म श्री चेवांग नोर्फेल ने जम्मू-कश्मीर राज्य में ग्रामीण विकास विभाग से सेवानिवृत्ति के बाद राज्य के लेह-लद्दाख क्षेत्र में पानी की भारी कमी को संबोधित करने का कार्य स्वयं के कंधों पर ले लिया। उन्होने इस समस्या के समाधान करने हेतु कृत्रिम हिमनद बनाने के लिए अथक काम किया। एक ऐसे क्षेत्र में जहां किसान अपने 80% कृषि जरूरतों के लिए हिमनदों के जल पर निर्भर हैं, कृत्रिम हिमनद उनके लिए एक वरदान हैं।

इससे पहले, सभा का स्वागत करते हुए, डॉ के सी खुल्बे, वरिष्ठ प्रधान वैज्ञानिक ने राष्ट्रीय विज्ञान दिवस समारोह की उत्पत्ति का वर्णन करते हुए बताया कि यह दिवस सर सी वी रमन द्वारा रमन प्रभाव की खोज को चिह्नित करने के लिए मनाया जाता है

अपने अध्यक्षीय भाषण में प्रोफेसर आलोक धवन, निदेशक, सीएसआईआर- भारतीय विषविज्ञान अनुसंधान संस्थान, ने प्रत्येक व्यक्ति को अपने विचार में विश्वास रखने और उसी को पूरा करने की दिशा में काम करने पर बल दिया और बताया कि यह सिद्धान्त पद्म श्री चेवांग नोर्फेल द्वारा बहुत ही अच्छे ढंग से प्रदर्शित किया गया है। उन्होंने कहा कि सीएसआईआर – आईआईटीआर को इस विज्ञान दिवस के अवसर पर  श्री नोर्फेल की मेजबानी करने का गौरव प्राप्त हुआ है।

यह दिवस संस्थान में एक खुले दिवस के रूप में मनाया गया, जिस दिन आम नागरिकों के लिए संस्थान के द्वार अत्याधुनिक विज्ञान अनुभव करने के लिए खुले रहे। इस अवसर पर संस्थान द्वारा विकसित प्रौद्योगिकियों और सेवाओं की एक प्रदर्शनी भी आयोजित की गई। शहर आधारित कॉलेजों/ विश्वविद्यालयों के 200 से अधिक स्नातक एवं स्नातकोत्तर छात्रों को संस्थान की प्रयोगशालाओं का दौरा करने और वैज्ञानिक कर्मचारियों के साथ बातचीत करने के लिए आमंत्रित किया गया।

डॉ डी कार चौधरी, अध्यक्ष, राष्ट्रीय विज्ञान दिवस समारोह समिति ने वक्ता का परिचय दिया और डॉ एन मानिकम, समिति के संयोजक ने धन्यवाद प्रस्ताव दिया

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