कार्यक्रम

हिंदी सप्ताह - 2021 का उद्घाटन समारोह

सी.एस.आई.आर.-भारतीय विषविज्ञान अनुसंधान संस्थान, लखनऊ में दिनांक 14 सितंबर, 2021 को हिंदी सप्ताह के उद्घाटन समारोह का ऑनलाइन आयोजन किया गया। डॉ. वी.पी. शर्मा, मुख्य वैज्ञानिक व राजभाषा अधिकारी, सीएसआईआर-आईआईटीआर ने हिंदी सप्ताह का उद्घाटन किया। इस अवसर पर सभा को संबोधित करते हुए डॉ. शर्मा ने कहा कि हिंदी दिवस, हिंदी कार्यान्वयन के बारे में चिंतन, मंथन करने और राजभाषा के बारे में संकल्प लेने का दिन है। उन्होंने कहा कि हिंदी बहुत सरल, मीठी और अनूठी भाषा है। इसके माध्यम से हम सभी प्रकार की प्रगति प्राप्त कर सकते हैं। हिंदी में हम अपने भावों और विचारों को बहुत सुंदर ढंग से व्यक्त कर सकते हैं। वैज्ञानिक एवं अन्य सभी कार्य हिंदी भाषा में किए जा सकते हैं, बस हमें दृढ़ संकल्प लेने की आवश्यकता हैं। कार्यालयी और अपने दैनिक कार्यों में हिंदी में बोलें, हिंदी में लिखें। हिंदी भाषा ने अनेकता को एकता में बांधने हेतु एक सूत्र के रूप में कार्य किया है। हिंदी भाषा की उन्नति देश की उन्नति है। डॉ. शर्मा ने कहा कि पर्यावरण, प्रदूषण और स्वास्थ्य के क्षेत्र में  संस्थान की बड़ी भूमिका है। हमारा संस्थान वार्षिक प्रतिवेदन, छमाही राजभाषा पत्रिका "विषविज्ञान संदेश", विषविज्ञान शोध पत्रिका, आदि का हिंदी में प्रकाशन कर रहा है। इसके साथ-साथ “विषविज्ञान शब्दावली” और “विषविज्ञान के नए आयाम” नामक पुस्तक का प्रकाशन भी किया गया है। पर्यावरण संरक्षण, प्रदूषण कम करने के उपाए प्लास्टिक के सुरक्षित उपयोग एवं जल संरक्षण आदि के बारे में संस्थान द्वारा हिंदी में अनेक लघु पुस्तकें/विवरणिकाएं प्रकाशित की गई हैं। संस्थान के हिंदी कार्यान्वयन को उच्च स्तर पर सराहना भी मिली है। संस्थान को  हिंदी कार्यान्वयन हेतु अनेक पुरस्कार पुरस्कार प्राप्त हो चुके हैं। अभी हाल में मिले पुरस्कार विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। संस्थान को क्षेत्रीय राजभाषा पुरस्कार हेतु वर्ष 2018-19 के लिए तृतीय और वर्ष 2019-20 के लिए  द्वितीय पुरस्कार हेतु चयन किया गया है। संस्थान की राजभाषा पत्रिका "विषविज्ञान संदेश" को भारत सरकार, गृह मंत्रालय से राजभाषा कीर्ति पुरस्कार योजना वर्ष 2019-20 में ‘क’ क्षेत्र के लिए द्वितीय पुरस्कार प्राप्त हुआ है। डॉ. आलोक पाण्डेय, प्रधान  वैज्ञानिक, सीएसआईआर–आईआईटीआर ने आधार व्याख्यान देते हुए कहा कि हिंदी दिवस, हिंदी कार्यान्वयन के बारे में गंभीरता से सोचने, योजनाएं बनाने एवं योजनाओं को मूर्तरूप देने हेतु संकल्प लेने का  दिन है। हमारे संस्थान का कार्य क्षेत्र विज्ञान है। विज्ञान, अनुसंधान और प्रौद्योगिकी से संबंधित कार्यों में हिंदी भाषा का प्रयोग एक चुनौती है, परंतु यह असंभव नहीं है। हिंदी बहुत सरल भाषा है एवं इसका शब्द भंडार बहुत समृद्ध है। अनेक भाषाओं के शब्दों को सहजता से आत्मसात करने की इसमें विशाल क्षमता है। हिंदी ने अरबी, तुर्की, फारसी, पुर्तगाली और अंग्रेजी आदि भाषाओं के अनगिनत शब्दों को इस प्रकार आत्मसात कर लिया है कि वे मूल हिंदी जैसे प्रतीत होते हैं। उन्होंने कहा कि विज्ञान और इंजीनियरिंग आदि विषयों की शिक्षा हिंदी माध्यम से दी जाए और उच्च कक्षाओं की पाठ्य पुस्तकों का हिंदी रूपांतरण उपलब्ध हो तथा शोध संस्थानों में हिंदी का प्रयोग बढ़ाया जाए। हिंदी समभाव का उदाहरण है, जैसा बोलते हैं वैसा ही लिखते हैं। आज के व्यावसायिक वातावरण में हम सभी को किसी भी मंच से हिंदी बोलने में संकोच नहीं करना चाहिए। हिंदी विचारों की अभिव्यक्ति का एक सशक्त माध्यम है। हमारे देश और समाज के लिए हिंदी का विकास बहुत ही आवश्यक है। भाषा अपने विकास में अन्य भाषाओं से शब्द लेती है और इसी क्रम में हिंदी भी अन्य भाषाओं के शब्दों को तेज़ी से आत्मसात कर रही है। आज के प्रगतिशील समाज में मोबाइल पर संदेश भेजने में परिवर्तित होती हिंदी को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। परिवर्तित होती हिंदी को समझें और इसके इस नए स्वरूप को स्वीकार करें। डॉ. ज्ञानेन्द्र मिश्र, नियंत्रक, वित्त एवं लेखा, सीएसआईआर-आईआईटीआर ने अपने संबोधन में कहा कि ऐसी सरल हिंदी बोलें और लिखें जिसे सभी समझ जाएं। भाषा के बारे में हमारा विचार व्यापक होना चाहिए। भाषा परिवर्तनशील होती है और समय के साथ परिवर्तित होती रहती है। शब्द नहीं बदलते परंतु उनके अर्थ बदल जाते हैं। उन्होंने कार्यालय के कार्यों में हिंदी कार्यान्वयन पर बल दिया। श्रीमती कुसुमलता, अनुभाग अधिकारी (सा.) ने समारोह का संचालन किया और सभी को राजभाषा की प्रतिज्ञा दिलाई। श्री के पी शर्मा, प्रशासन नियंत्रक, सीएसआईआर-आईआईटीआर ने अवगत कराया कि हिंदी सप्ताह (14-20 सितंबर, 2021) के दौरान कार्यदिवसों में संस्थान में विभिन्न प्रतियोगिताओं: प्रश्नोत्तरी, स्लोगन, वाद-विवाद, आशुभाषण, हिंदीतर भाषी का हिंदी ज्ञान, लेख, अनुवाद, प्रस्तुतीकरण, कविता/कहानी की रचना आदि का आयोजन किया जाएगा। उन्होंने   संस्थान  के कर्मचारियों और छात्रों से  प्रतियोगिताओं में उत्साह पूर्वक प्रतिभगिता करने हेतु अनुरोध भी किया। समारोह के अंत में श्री शर्मा ने धन्यवाद ज्ञापन दिया। 

हिंदी सप्ताह - 2021 का पुरस्कार वितरण एवं समापन समारोह

दिनांक 20 सितंबर, 2021 को पुरस्कार वितरण समारोह का आयोजन किया गया। कोविड-19 से सुरक्षा के कारण विभिन्न प्रभागों के प्रमुखों एवं वैज्ञानिकों तथा पुरस्कार विजेताओं के अतिरिक्त शेष स्टाफ सदस्य एवं छात्रगण कार्यक्रम में ऑनलाइन सम्मिलित हुए। इस अवसर पर श्री दिलीप कुमार, आई.आर.एस., विशेष सचिव, बिहार सरकार एवं सीएमडी, बिहार स्टेट फाइनेंशियल कॉर्पोरेशन मुख्य अतिथि थे। श्री दिलीप कुमार ने अपने संदेश में कहा कि देश की प्रगति में वैज्ञानिकों की महत्वपूर्ण भूमिका है और भाषा को लेकर अनुसंधान में कोई बाधा नहीं आनी चाहिए। उन्होंने कहा कि भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में सम्मिलित असमिया, उड़िया, गुजराती, तमिल, संथाली, संस्कृत और बांग्ला, आदि सभी 22 भाषाओं के शब्दों को हमें सीखना चाहिए और आवश्यकता अनुसार इनके शब्दों को हिंदी में सम्मिलित करना चाहिए। उन्होंने कहा कि हमारे देश की विभिन्न बोलियाँ और भाषाएं हमारी मजबूती का प्रतीक और परिचायक हैं और हमारे देश के विकास में सभी का महत्वपूर्ण योगदान है। इस अवसर पर श्री दिलीप कुमार द्वारा लिखित पुस्तक "अप–डाउन में  फंसी ज़िंदगी"  सीएसआईआर-आईआईटीआर को भेंट किया। मुख्य अतिथि महोदय ने संबोधन से पूर्व हिंदी सप्ताह (14-20 सितंबर, 2021) के दौरान संस्थान में आयोजित वाद-विवाद, आशुभाषण, हिंदीतर भाषी का हिंदी ज्ञान, लेख, अनुवाद, प्रस्तुतीकरण, कविता/कहानी की रचना आदि प्रतियोगिताओं के विजयी प्रतिभागियों को एवं प्रोत्साहन योजना हेतु पुरस्कार प्रदान किए। इससे पूर्व श्री चन्द्र मोहन तिवारी, हिंदी अधिकारी, सीएसआईआर-आईआईटीआर ने सभा का स्वागत किया। डॉ. वी.पी. शर्मा, मुख्य वैज्ञानिक व राजभाषा अधिकारी, सीएसआईआर-आईआईटीआर ने मुख्य अतिथि महोदय का परिचय देते हुए बताया कि श्री दिलीप कुमार, आईआरएस ने भाषा की पद एवं गद्य दोनों शैलियों में बहुत कार्य किया है। विभिन्न समाचार पत्र, दूरदर्शन और पत्रिकाओं आदि में आपके लेख और कविताएं प्रकाशित होते रहते हैं, हिंदी भाषा के क्षेत्र में आपका योगदान सराहनीय है। डॉ. एन. मणिक्कम, मुख्य वैज्ञानिक, सीएसआईआर-आईआईटीआर ने समारोह की अध्यक्षता  किया। उन्होंने अध्यक्षीय संबोधन में कहा कि व्यक्ति के जीवन  में भाषा का  बहुत अधिक महत्व है। भाषा ही व्यक्तियों को जोड़ती है। हिंदी भाषा की उन्नति  देश की उन्नति है। हमारे संस्थान ने हिंदी भाषा में बहुत कार्य किया है। संस्थान को अनेक पुरस्कार प्राप्त हो चुके हैं। संस्थान का अभी हाल में क्षेत्रीय राजभाषा पुरस्कार वर्ष 2018-19 के लिए तृतीय और वर्ष 2019-20 के लिए द्वितीय हेतु चयन किया गया है। संस्थान की राजभाषा पत्रिका ‘विषविज्ञान संदेश’ को भारत सरकार, गृह मंत्रालय से राजभाषा कीर्ति पुरस्कार योजना वर्ष 2019-20 में ‘क’ क्षेत्र के लिए अखिल भारतीय स्तर पर द्वितीय पुरस्कार प्राप्त हुआ है। उन्होंने संस्थान के स्टाफ से हिंदी में और अधिक कार्य करने हेतु अनुरोध भी किया। श्री के. प्रसाद शर्मा, प्रशासन नियंत्रक, सीएसआईआर-आईआईटीआर ने समारोह के अंत में धन्यवाद ज्ञापन दिया। 

संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा निर्दिष्ट प्रथम विश्व पर्यावरण दिवस 05 जून, 1974 को मनाया गया था। तब से निरंतर विभिन्न प्रकार के पर्यावरणीय मुद्दों जैसे - वायु एवं प्लास्टिक प्रदूषण, वन्यजीवों का अवैध व्यापार, संधारणीय खपत, ग्लोबल वार्मिंग, खाद्य सुरक्षा  आदि पर ध्यान केंद्रित करने हेतु इस दिन को एक वैश्विक मंच बनाने के लिए चिह्नित किया गया है। ये आयोजन संपूर्ण विश्व में पर्यावरण नीतियों को आकार देने में भी भूमिका निभाते हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ ने वर्ष 2021 से प्रारंभ दशक में पारिस्थितिकी तंत्र के पुनःस्थापन  पर बल दिया है, जिसमें  जीवन को सहायता करने वाले वातावरण की पुनर्कल्पना, पुनर्निर्माण तथा पुनर्स्थापना की दिशा में पुनः प्रयास करना है।

सीएसआईआर-भारतीय विषविज्ञान अनुसंधान संस्थान (सीएसआईआर-आईआईटीआर) लखनऊ में वर्चुअल मोड में विश्व पर्यावरण दिवस समारोह का आयोजन किया गया। इस  अवसर पर वर्चुअल मोड के माध्यम से 25 वें डॉ. सी.आर. कृष्णमूर्ति स्मृति व्याख्यान देते हुए, हिमालय पर्यावरण अध्ययन एवं संरक्षण संगठन (एचईएससीओ) के संस्थापक पद्म भूषण श्री अनिल प्रकाश जोशी ने कहा कि पर्यावरण की दृष्टि से संधारणीय प्रौद्योगिकियों के विकास को सुनिश्चित करना वर्तमान समय की माँग है। समृद्धि सुनिश्चित करना विकास से अधिक महत्वपूर्ण है। जहां विकास असमानता पैदा करता है, वहीं समृद्धि अधिक न्यायसंगत और सर्वव्यापी है। संस्थान द्वारा अपने द्वितीय निदेशक की स्मृति में विश्व पर्यावरण दिवस समारोह के एक भाग के रूप में प्रत्येक वर्ष यह व्याख्यान आयोजित किया जाता है। प्रशिक्षण से वनस्पतिशास्त्री तथा एक प्रसिद्ध हरित कार्यकर्ता श्री जोशी ने अर्थव्यवस्था और पारिस्थितिकी दोनों को सम्मिलित करने वाले समुदाय के समावेशी विकास के महत्व को दोहराया। उनकी अवधारणा "स्थानीय आवश्यकताएं, स्थानीय स्तर पर पूर्ण हों" भारत के संपूर्ण पहाड़ी क्षेत्र में लोकप्रिय हो गई है। जीवन रूपों के अस्तित्व को सुनिश्चित करने में सकल पर्यावरण उत्पाद की भूमिका को दोहराते हुए उन्होंने कहा कि जीईपी के बिना जीडीपी पृथक रूप से कार्य नहीं कर सकता है।

प्रोफेसर एस.के. बारिक, निदेशक, सीएसआईआर-आईआईटीआर ने संस्थान में आयोजित समारोह की अध्यक्षता की। निदेशक महोदय ने अपने संबोधन में संरक्षित  एवं सुरक्षित पोस्ट-कोविड विश्व की दिशा में सीएसआईआर-आईआईटीआर के योगदान पर प्रकाश डाला। अपने विचार साझा करते हुए उन्होंने व्यावसायिक स्वास्थ्य एवं पर्यावरण विषविज्ञान का सुदृढ़ आधार रखने में डॉ. सी.आर. कृष्णमूर्ति की भूमिका को याद किया, जिस पर अब संस्थान केंद्रित है।

आयोजन के दौरान, सीएसआईआर-आईआईटीआर  द्वारा प्री मानसून आकलन पर आधारित लखनऊ शहर की परिवेशी वायु  गुणवत्ता की वार्षिक रिपोर्ट जारी की गई और सीएसआईआर कर्मचारियों के बच्चों के बीच आयोजित  एक ऑनलाइन पेंटिंग प्रतियोगिता के पुरस्कार विजेताओं की घोषणा भी की गई । समारोह के एक भाग के रूप में प्रतियोगिता इसी सप्ताह में पहले आयोजित की गई थी।

सीएसआईआर-भारतीय विषविज्ञान अनुसंधान संस्थान (सीएसआईआर-आईआईटीआर) का 56वां वार्षिक दिवस 15 नवंबर, 2021 को मनाया गया। कोविड - 19 वैश्विक महामारी के वर्तमान परिदृश्य को देखते हुए समारोहों का आयोजन लाइव स्ट्रीमिंग के साथ हाइब्रिड मोड में किया गया था। प्रतिभागियों ने एमएस टीम्स प्लेटफॉर्म के माध्यम से समारोह में भाग लिया।

समारोह का मुख्य आकर्षण 25वां एस.एच. ज़ैदी स्मृति व्याख्यान था। यह व्याख्यान डॉ. रिचर्ड वोयचिक, निदेशक, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ इन्वाइरोंमेटल हेल्थ साइंसेज (एनआईईएचएस) व नेशनल टॉक्सिकोलोजी प्रोग्राम (एनटीपी), यूएसए द्वारा दिया गया। डॉ. वोयचिक ने अपने व्याख्यान के दौरान मानव स्वास्थ्य में पर्यावरण की भूमिका की खोज में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ इन्वाइरोंमेटल हेल्थ साइंसेज (एनआईईएचएस) के मिशन का विवरण देते हुए श्रोताओं  को मुग्ध कर दिया। उन्होंने कहा कि एनआईईएचएस सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार एवं रोग तथा विकलांगता को रोकने के लिए नवीन अनुसंधान को बढ़ावा देने हेतु प्रयासरत है। व्याख्यान ने वैश्विक पर्यावरणीय स्वास्थ्य की चुनौतियों हेतु रणनीतिक दृष्टिकोण पर ध्यान केंद्रित करते हुए शोध संस्थानों की आंतरिक एवं बाह्य वैज्ञानिक गतिविधियों का एक संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत किया।

इस शुभ अवसर पर प्रोफेसर एस.के. बारिक, निदेशक, सीएसआईआर-आईआईटीआर ने संस्थान की वार्षिक रिपोर्ट प्रस्तुत की । अपने संबोधन में प्रोफेसर बारिक ने संबंधित वर्ष में संस्थान को प्राप्त सफलताओं के बारे में सभा को अवगत कराया,  विशेष रूप से कोविड -19 संकट के विरुद्ध संघर्ष में संस्थान के योगदान का उल्लेख किया। उन्होंने यह भी कहा कि संस्थान अब मशीन लर्निंग एवं आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की अत्याधुनिक तकनीकों पर भी ध्यान  केंद्रित कर रहा है। सीएसआईआर “जिज्ञासा” पहल के अंतर्गत आयोजित “एम्पावरिंग प्यूपिल इनोवेशन एंड क्रिएटिविटी” (ईपीआईसी-2021) कार्यक्रम के परिणाम भी समारोह के दौरान घोषित किए गए। इस अवसर पर लखनऊ शहर की पोस्ट मानसून पर्यावरण स्थिति रिपोर्ट भी जारी की गई।

इससे पूर्व  डॉ. नटेसन मनिक्कम, मुख्य वैज्ञानिक, सीएसआईआर-आईआईटीआर ने अतिथि महोदय का परिचय दिया।

वर्तमान में दूर–दूर तक फैली हुई कोविड-19 वैश्विक महामारी के प्रकोप से संपूर्ण विश्व महाविपत्ति से जूझ रहा है। इतिहास ऐसे अनेक उदाहरणों से परिपूर्ण है कि विज्ञान ने सदियों से जीवन के अस्तित्व एवं मानक में कैसे सुधार किया है। हमारे जैसे बड़े देश में  एक अरब से अधिक लोगों का  बेहतर जीवन सुनिश्चित करने के लिए विज्ञान और प्रौद्योगिकी पर आधारित एक सुदृढ़ व्यवस्था आवश्यक है। डॉ. संजय सिंह, सीईओ, जीनोवा बायोफार्मास्युटिकल्स लिमिटेड, पुणे ने इसी प्रकार के विचारों से युक्त सीएसआईआर स्थापना दिवस व्याख्यान दिया। व्याख्यान का शीर्षक "साइंटिफिक टेम्पर इन चेंजिंग टाइम्स" था। वह सीएसआईआर-भारतीय विषविज्ञान अनुसंधान संस्थान, लखनऊ में वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद के 79वें स्थापना दिवस समारोह में व्याख्यान दे रहे थे। उन्होंने कहा कि नए ज्ञान तथा  नई क्षमता के सामने पूर्वकल्पित धारणाओं को चुनौती देने की क्षमता की खोज वैज्ञानिक प्रयासों की सफलता के लिए देश की जरूरतों को पूरा करने हेतु महत्वपूर्ण है जो आत्मनिर्भर भारत बनाने की दिशा में है। इन पंक्तियों के आधार पर, उन्होंने कहा कि जेनोवा बायोफर्मासिटिकल वर्तमान में HGC019 की ओर काम कर रहा है, COVID-19 के खिलाफ एक निवारक और सुरक्षात्मक उपाय के रूप में एक mRNA टीका है।

महामारी की स्थिति के कारण समारोह वर्चुअल मोड में हुआ। वैज्ञानिक समुदाय के कई वरिष्ठ सदस्य, जिनमें प्रोफेसर समीर के. ब्रह्मचारी, पूर्व महानिदेशक, सीएसआईआर और सीएसआईआर संस्थानों के पूर्व निदेशक डॉ वी पी कंबोज, पूर्व निदेशक, सीएसआईआर-सीडीआरआई; डॉ पी के सेठ, पूर्व निदेशक, सीएसआईआर-आईआईटीआर; डॉ. अभय देशपांडे, निदेशक, इनोवेशन और स्ट्रेटेजी जय रिसर्च फाउंडेशन; डॉ. आर सी श्रीमाल, पूर्व निदेशक, सीएसआईआर-आईआईटीआर, शामिल रहे। डॉ. एम के भट, निदेशक, एनसीसीएस पुणे ने इस अवसर पर भाग लिया।

डॉ. देवेंद्र परमार, मुख्य वैज्ञानिक, सीएसआईआर-आईआईटीआर, तथा अध्यक्ष, समारोह आयोजन समिति ने सभी का स्वागत किया और सभी को वक्ता का परिचय दिया।

प्रोफेसर आलोक धावन, निदेशक सीएसआईआर-आईआईटीआर ने समारोह की अध्यक्षता की। प्रोफेसर धावन ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में कहा कि कोविड-19 की वैश्विक महामारी के विरुध  संघर्ष में सीएसआईआर की भूमिका निदान, उपचार, अस्पताल उपकरण, आपूर्ति श्रृंखला, जीनोम अनुक्रमण आदि जैसे विभिन्न क्षेत्रों में योगदान के साथ अभूतपूर्व रही है। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि छात्र समुदाय से जुड़े अधिक कार्यक्रम करने के उपरांत सीएसआईआर प्रयोगशालाओं में ग्रीष्मकालीन प्रशिक्षण कार्यक्रम की अधिक मांग हुई है। उन्होंने कहा कि इस चुनौतीपूर्ण समय में, सीएसआईआर-आईआईटीआर ने, सीएसआईआर की  प्रयोगशालाओं के साथ मिलकर ऑनलाइन माध्यम से  75 छात्रों हेतु "समर रिसर्च ट्रेनिंग प्रोग्राम-2020" (एसआरटीपी-2020) का सफलतापूर्वक आयोजन किया।

भारत के माननीय प्रधानमंत्री, श्री नरेंद्र मोदी जी, जो सीएसआईआर सोसाइटी के अध्यक्ष भी हैं; श्री वेंकट सुब्रमण्यन, भारत के उपराष्ट्रपति; और भारत सरकार के विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्री माननीय डॉ. हर्षवर्धन ने सीएसआईआर के प्रयासों की सराहना की और पूरे सीएसआईआर परिवार को अपना आशीर्वाद दिया।

इस अवसर पर संस्थान में 25 वर्ष की सेवा पूर्ण करने वाले एवं  पिछले वर्ष सेवानिवृत्त हुए कर्मचारियों को सम्मानित किया गया। पिछले वर्ष के दौरान शिक्षा में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले सीएसआईआर-आईआईटीआर के कर्मचारियों के बच्चों को भी पुरस्कार दिए गए ।

डॉ. रवि राम कृष्टिपटि, प्रधान वैज्ञानिक, सीएसआईआर-आईआईटीआर एवं कार्यक्रम के संयोजक ने धन्यवाद ज्ञापित किया।

भारत ने 11 मई, 1998 को पोखरण में परमाणु बमों का सफलतापूर्वक परीक्षण किया था। इसी कारण प्रत्येक वर्ष 11 मई को राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी दिवस के रूप में मनाया जाता है। यह  समारोह हमारे दैनिक जीवन में प्रौद्योगिकीय नवाचारों की महत्वपूर्ण भूमिका को उजागर करते हैं और छात्रों को विज्ञान को कैरियर के रूप में अपनाने हेतु प्रोत्साहित करते हैं। यह घटना विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में हमारे वैज्ञानिकों और इंजीनियरों के महत्वपूर्ण उल्लेखनीय प्रगति पर भी प्रकाश डालती है।

सीएसआईआर-भारतीय विषविज्ञान अनुसंधान संस्थान (सीएसआईआर-आईआईटीआर), लखनऊ में सोशल नेटवर्किंग प्लेटफ़ॉर्म के माध्यम से सभी छात्रों, कर्मचारियों और वैज्ञानिकों के साथ राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी दिवस मनाया गया। प्रोफेसर आलोक धावन, निदेशक, सीएसआईआर-आईआईटीआर ने शुभारंभ संदेश में विज्ञान और प्रौद्योगिकी की उन्नति में  सीएसआईआर के योगदान पर प्रकाश डाला। प्रोफेसर थलप्पिल प्रदीप, संस्थान के प्रोफेसर और प्रोफेसर रसायन विज्ञान, रसायन विज्ञान विभाग, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, मद्रास ने प्रौद्योगिकी दिवस व्याख्यान दिया। प्रोफेसर प्रदीप आणविक सामग्री और सतह के क्षेत्र में अग्रणी हैं। वर्तमान स्थिति को ध्यान में रखते हुए, उन्होंने "महामारी के दौरान एवं उसके बाद में शैक्षणिक संस्थानों में नवाचार" शीर्षक पर आकर्षणीय व्याख्यान दिया। उन्होंने इस अवसर पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि जब हम अतीत की महामारियों को ध्यान करते हैं तो देखते हैं कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी ने सदैव  समाधान प्रदान किया है। उन्होंने कहा कि "विश्व को आज संधारणीय आजीविका, खाद्य, नई पैकेजिंग सामग्री, स्वास्थ्यकर दृष्टि से परिपूर्ण एवं स्वतः पूर्ण  घरों जैसे स्थायी समाधानों की आवश्यकता है"। इसका दूसरा पहलू यह है कि संकट की स्थिति के दौरान, मूलभूत मानवीय मूल्य मजबूत हुए हैं। लोग एकजुट हुए हैं और सामूहिकता बढ़ी है। प्रोफेसर आलोक धावन, निदेशक सीएसआईआर-आईआईटीआर ने समापन के अवसर पर छात्र समुदाय से अपने जुनून को अपने उद्देश्य में बदलने और अंततः अपने व्यवसाय में बदलने हेतु आग्रह किया। उन्होंने कहा कि भारतीय वैज्ञानिक समुदाय इस महामारी की बीमारी को समाप्त करने हेतु कठोर परिश्रम परिश्रम कर रहा है और उन्होंने आशा प्रकट किया कि सामूहिक प्रयासों से स्थिति में शीघ्र ही सुधार होगा"।

यथापूर्व स्थिति (status quo) को चुनौती दें, हमेशा पूछें कि क्यों / कैसे

यह संदेश लेफ्टिनेंट जनरल (डॉ.) बिपिन पुरी, पीवीएसएम, वीएसएम (सेवानिवृत्त), कुलपति, किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय, लखनऊ ने राष्ट्रीय विज्ञान दिवस 2021 के दौरान सीएसआईआर-भारतीय विषविज्ञान अनुसंधान संस्थान  (सीएसआईआर-आईआईटीआर) द्वारा आज आयोजित व्याख्यान में दिया।

लेफ्टिनेंट जनरल पुरी ने अपने संबोधन में कहा कि आउट ऑफ द बॉक्स सोच, एंटरप्रेन्योरिंग की पहल और कड़ी मेहनत का एक विवेकपूर्ण संयोजन ही वैज्ञानिक सफलता की कुंजी है। हमारे देश के सबसे ज्यादा प्यार पाने वाले वैज्ञानिक पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि विज्ञान मानवता के लिए एक सुंदर उपहार है और सभी को हमेशा मानव जाति की बड़ी भलाई के लिए इसका उपयोग करने का प्रयास करना चाहिए। डॉ. पुरी ने दोहराया कि हाल ही में शुरू की गई विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार नीति (एसटीआईपी) इस महान देश के वैज्ञानिक समुदाय के सफल प्रयासों की नींव रखेगी।

इससे पहले, अपने स्वागत भाषण में, सीएसआईआर-आईआईटीआर और आयोजन समिति के अध्यक्ष, मुख्य वैज्ञानिक डॉ. एन. मनिकम ने देश में विज्ञान दिवस समारोह की शुरुआत के बारे में बात की। भारत 28 फरवरी 1928 को नोबेल पुरस्कार विजेता और भारतीय भौतिक विज्ञानी सर चंद्रशेखर वेंकट रमन द्वारा रमन प्रभाव की खोज के लिए हर साल 28 फरवरी को राष्ट्रीय विज्ञान दिवस मनाता है।

अध्यक्षीय भाषण देते हुए, प्रोफेसर एस. के. बारिक, निदेशक सीएसआईआर-आईआईटीआर ने कहा कि किसी भी वैज्ञानिक खोज / आविष्कार की क्षमता का एहसास तभी होता है जब यह मानव की जरूरतों को पूरा करने और प्रगति की राह में बाधाओं को कम करने में योगदान देता है। उन्होंने वैज्ञानिक समुदाय को "आत्मनिर्भर भारत" के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अपने आप को पुनः समर्पित करने का आह्वान किया। 

डॉ. के. रवि राम, प्रमुख वैज्ञानिक, सीएसआईआर-आईआईटीआर और संयोजक, आयोजन समिति ने धन्यवाद प्रस्ताव दिया। 

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