घटनाक्रम

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सीएसआईआर-भारतीय विषविज्ञान अनुसंधान संस्‍थान ने 04 नवंबर, 2015 को हर्ष और उल्‍लास के साथ अपना स्‍वर्ण जयंती स्‍थापना दिवस मनाया।  पदम विभूषण प्रोफेसर एम.एस. वलियथन, नेशनल रिसर्च प्रोफेसर तथा भू‍तपूर्व वाइस चांसलर, मनीपाल विश्वविद्यालय ने स्‍थापना दिवस व्‍याख्‍यान दिया और पदम श्री डॉ. नित्‍या आनंद, भूतपूर्व निदेशक, सीएसआईआर-सीडीआरआई ने समारोह की अध्यक्षता की। इस अवसर पर प्रोफेसर आर. कुमार, फेलो, जे.एन.सी.ए.एस.आर. तथा संस्‍थान के अनुसंधान परिषद के अध्यक्ष तथा प्रोफेसर डायना एंडरसन, इस्‍टैबलिस्‍ड चेयर, यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रैडफोर्ड भी उपस्थित थी। 

वार्षिक प्रतिवेदन प्रस्‍तुत करते हुए प्रोफेसर आलोक धावन, निदेशक, सीएसआईआर-आईआईटीआर ने वर्ष 1965 में इसकी स्‍थापना के समय से प्रोफेसर सिब्‍ते हसन जैदी के उत्कृष्ट नेतृत्‍व में विषविज्ञान अनुसंधान के क्षेत्र में अग्रणी रहने और इसकी उपलब्धियों का वर्णन किया। संस्‍थान को दक्षिण-पूर्व एशिया में सार्वजनिक निधि प्राप्‍त विषविज्ञान अनुसंधान का संस्‍थान होने का गौरव प्राप्‍त है।  संगठन ने चुनौतियों का सामना करते हुए रसायनों के व्‍यावसायिक एवं पर्यावरिक प्रभावन से होकर अत्‍याधुनिक प्रौद्योगिकी का उपयोग कर सेलुलर स्‍तर पर विषविज्ञान की क्रियाविधि को समझने पर अपना ध्‍यान केंद्रित किया है।  इस प्रगति से शैक्षिक, उद्योग और नियामक निकायों से वैश्विक स्तर पर अनुसंधान में सहयोग किया गया है।

संस्‍थान राष्ट्रीय आपदा जैसे भोपाल गैस त्रासदी 1984, उड़ीसा चक्रवात 1999, भुज भूकंप 2001 में वैज्ञानिक सहायता पहुँचाने में अग्रणी रहा है।  साथ ही राष्ट्रीय मिशन कार्यक्रमों जैसे गंगा एक्‍शन प्‍लान, स्‍वच्‍छ गोमती मिशन, स्‍वच्‍छ भारत, स्‍वस्‍थ भारत, नमामि गंगे, स्किल इंडिया, डिजी‍टल इंडिया इत्‍यादि में भी प्रतिभागिता किया है।  संस्‍थान में मानव संसाधन विकास और तैनाती में व्‍यापक योगदान दिया है।  संस्‍थान ने हाई इंपेक्‍ट फैक्‍टर के पियर रिव्‍यू जर्नल्‍स में 142 शोधपत्र प्रकाशित किया है, पिछले वर्ष 19 रिसर्च फेलो ने पी.एच.डी. की उपाधि प्राप्‍त की है और ए.सी.एस.आई.आर. के अंतर्गत वर्तमान में 102 छात्रों ने पंजीकरण किया है।  संस्‍थान सीएसआईआर का एकमात्र अनोखा संस्‍थान है जिसे ओ.ई.सी.डी. द्वारा गुड लैबोरेटरी प्रैक्टिस का प्रमाणपत्र प्राप्‍त है और यह मेक इन इंडिया के उददेश्‍य में भी सहायता प्रदान करता है, जिसके अंतर्गत एम.एस.एम.ई. को अपने उत्‍पादों को वैश्विक रूप में स्‍थापित करने में भी सहायता मिलती है।  

समारोह में सीएसआईआर-आईआईटीआर लोगो, अनुसंधान की सफलता के साहित्‍य का संकलन, स्‍वर्ण जयंती स्‍मारिका एवं पिछले 50 वर्षों में प्रदान की गयी पी.एच.डी. के दस्‍तावेजों को जारी किया गया।

अपने संबोधन में प्रोफेसर आर. कुमार ने किसी भी अनुसंधान गतिविधि के मुख्‍य बिंदुओं पर बल दिया, उदाहरण – उत्कृष्टता एवं प्रासंगिकता।  संस्‍थान को अपने आधारभूत ढॉंचे और योग्‍यता पर केंद्रित करना होगा ताकि इसके अधिदेश को पूरा किया जा सके। 

प्रोफेसर डायना एंडरसन ने लंबे समय से संस्‍थान के साथ संपर्क को याद किया और वैज्ञानिकों से कहा कि वे बीमार, बूढे, गर्भवती और प्रभावित जनसंख्‍या पर ध्‍यान देना चाहिए, साथ ही संक्रामक रोगों की अनसुलझी आवश्‍यकताओं पर भी ध्‍यान देना चाहिए।

स्‍थापना दिवस व्‍याख्‍यान देते हुए प्रोफेसर वलियथन ने वैज्ञानिक समुदाय को सलाह दिया कि सामाजिक/जन स्‍वास्‍थ्‍य के लाभ पर अनुसंधान की प्रासांगिकता पर ध्‍यान देना चाहिए।  उन्‍होंने कहा कि नमक में आयोडीन उपलब्‍ध कराना अनुसंधान का एक अच्‍छा तरीका है जो बहुत लोगों तक पहुँचकर सामाजिक लाभ देता है।  उन्‍होंने कहा कि किसी भी सामाजिक कार्यक्रम का सोशल ऑडिट करना इसका अभिन्‍न अंग है।

अध्यक्षीय भाषण में डॉ. नित्‍या आनंद ने कहा कि संस्‍थान प्रगति के पथ पर अग्रसर है और पर्यावरण की चुनौतियों उदाहरण – जलवायु परिवर्तन और जल गुणवत्‍ता के क्षेत्र में ऊँचाईयों को प्राप्‍त करेगा।

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सीएसआईआर-भारतीय विषविज्ञान अनुसंधान संस्‍थान में हिंदी सप्‍ताह 2015 के उद्घाटन समारोह का आयोजन

 

सीएसआईआर-भारतीय विषविज्ञान अनुसंधान संस्‍थान में दिनांक 14 सितंबर, 2015 को हिंदी सप्‍ताह 2015 के उद्घाटन समारोह का आयोजन किया गया।  इस अवसर पर श्री चन्‍द्र मोहन तिवारी, हिंदी अधिकारी ने सभी का स्‍वागत किया। कार्यक्रम के आरंभ में डॉ. आर.सी. मूर्ति, मुख्‍य वैज्ञानिक ने राष्ट्र की सेवा में 50 वर्षों से समर्पित विषय पर अपना प्रस्‍तुतीकरण दिया। इस अवसर पर सीडीआरआई के वरिष्ठ हिंदी अधिकारी डॉ. वी.एन. तिवारी ने राजभाषा प्रबंधन पर अतिथि व्‍याख्‍यान दिया। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए संस्‍थान के निदेशक प्रोफेसर आलोक धावन ने अपने संबोधन में कहा कि किसी भी देश की उन्‍नति में भाषा का बहुत ही गहरा योगदान है।  भाषा की अभिव्‍यक्ति से इसका विकास होता है।  हिंदी एक समृद्ध भाषा है। संस्‍थान के नौ अनुभागों में  संपूर्ण कार्य हिंदी में होता है।  वैज्ञानिक संस्‍थान होने के बावजूद यहां हिंदी का अधिक से अधिक प्रयोग होता है इसीलिए संस्‍थान की राजभाषा पत्रिका कई बार पुरस्‍कृत हो चुकी है।  हमारे संस्‍थान के वैज्ञानिक, तकनीकी एवं प्रशासनिक कर्मियों और शोध छात्रों का राजभाषा कार्यान्‍वयन में काफी सहयोग रहा है।  संस्‍थान में हिंदी में शोध पत्र प्रकाशित हुए हैं।  संस्‍थान का प्रयास रहा है कि विज्ञान की उपलब्धि को ग्रामीण भारत तक पहुँचाएं।  

 

श्री सी०पी०अरुणन, प्रशासन नियंत्रक ने धन्यवाद प्रस्ताव दिया।

 

हिंदी सप्ताह 2015 के पुरस्‍कार वितरण एवं समापन समारोह का आयोजन

 

सीएसआईआर-भारतीय विषविज्ञान अनुसंधान संस्थान (आई.आई.टी.आर.) लखनऊ में दिनांक 21.09.2015 को अपराह्न 3:00 बजे हिंदी सप्ताह 2015 के पुरस्‍कार वितरण एवं समापन समारोह का आयोजन किया गया। श्री चन्‍द्र मोहन तिवारी, हिंदी अधिकारी ने सभी का स्‍वागत किया। 

 

इस अवसर पर मुख्‍य अतिथि डॉ. ओ.के. सिन्‍हा, निदेशक, भारतीय गन्‍ना अनुसंधान संस्‍थान, लखनऊ थे। मुख्‍य अतिथि ने कहा कि हिंदी को सशक्‍त भाषा की तरह स्‍थापित करना होगा।यह संपर्क की भाषा है। वे संस्‍थान में हिंदी की प्रगति से काफी प्रभावित हुए।  कार्यक्रम की अध्यक्षता संस्‍थान के निदेशक, प्रोफेसर आलोक धावन ने की।  उन्‍होंने कहा कि हमारे संस्‍थान के वैज्ञानिक, तकनीकी एवं प्रशसनिक कर्मी और शोध छात्र हिंदी का भरपूर प्रयोग करते हैं। हिंदी को कठिन न बनाकर सरल भाषा में प्रयोग किया जाए, ताकि सभी लोग समझ सकें। समय-समय पर हमारे वैज्ञानिक डी0डी0 किसान चैनल पर शोध से संबंधित सूचना देते हैं। उन्‍होंने कहा कि संस्‍थान में हिंदी के प्रयोग के लिए डिजिटल टूल्‍स का भरपूर प्रयोग किया जा रहा है।  संस्‍थान की वेबसाइट पूर्णतया हिंदी में है और ई-मेल भी हिंदी में भेजा जाता है। 

 

इस अवसर पर हिंदी सप्‍ताह के दौरान आयोजित वाद-विवाद, आशुभाषण, लेख, टिप्पण व मसौदा लेखन, हिंदीतर भाषी का हिंदी ज्ञान, हिंदी टंकण, अनुवाद एवं क्विज प्रतियोगिताओं में विजयी प्रतिभागियों को प्रथम, द्वितीय व तृतीय पुरस्कार एवं प्रमाणपत्र प्रदान किये गए। इसके अलावा वर्ष में हिंदी में कार्य करने की प्रोत्साहन योजना के अन्तर्गत विजयी प्रतियोगियों को दो प्रथम, तीन द्वितीय और पॉंच तृतीय तथा सबसे अधिक हिंदी में डिक्‍टेशन का एक पुरस्कार और प्रमाण पत्र भी प्रदान किया गया।

 

श्री सी0पी0 अरुणन, प्रशासन नियंत्रक ने धन्‍यवाद प्रस्‍ताव दिया।

प्रोफेसर पी बलराम ने "रासायनिक पारिस्थितिकीय: ब्रिजिंग जीव विज्ञान और प्राकृतिक उत्पाद रसायन शास्त्र" विषय पर 20वां डॉ सी.आर. कृष्णमूर्ति स्मृति व्याख्यान दिया। उन्होने उल्लेख किया कि जीव विज्ञान में उल्लेखनीय रासायनिक विविधता का सामना करना पड़ता है और जीवों में विभिन्न जैव रासायनिक संचार पर अपने अद्भुत प्रभाव डालता है।  

सीएसआईआर -भारतीय विषविज्ञान अनुसंधान संस्थान में पर्यावरण दिवस समारोह विज्ञान और प्रौद्योगिकी के एक उचित समन्वय के साथ आयोजित किया गया। संस्थान के निदेशक प्रोफेसर आलोक धावन ने प्रो॰ पी बलराम, पूर्व निदेशक, भारतीय विज्ञान संस्थान, बेंगलुरू और प्रोफेसर इंद्रनील मन्ना, निदेशक, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, कानपुर का स्वागत करते हुए कहा कि इनकी उपस्थिति सामाजिक लाभ के लिए प्रौद्योगिकियों में बुनियादी विज्ञान अनुसंधान के अनुवाद की ओर संस्थान की प्रतिबद्धता को दर्शाती है। शहर के सीएसआईआर संस्थानों के कई पूर्व निदेशक डॉ नित्या आनंद, प्रोफेसर बी एन धवन, डॉ वी पी कम्बोज और प्रोफेसर पी के सेठ भी इस अवसर पर उपस्थित थे। इसके अलावा पूर्व और वर्तमान में सीएसआईआर-आईआईटीआर में कार्यरत वैज्ञानिक और कर्मचारी भी उपस्थित रहे।

इस अवसर पर प्रोफेसर पी बलराम ने "रासायनिक पारिस्थितिकीय: ब्रिजिंग जीव विज्ञान और प्राकृतिक उत्पाद रसायन शास्त्र" विषय पर 20वां डॉ सी.आर. कृष्णमूर्ति स्मृति व्याख्यान दिया। उन्होने उल्लेख किया कि जीव विज्ञान में उल्लेखनीय रासायनिक विविधता का सामना करना पड़ता है और जीवों में विभिन्न जैव रासायनिक संचार पर अपने अद्भुत प्रभाव डालता है।  डॉ डी कार चौधरी, मुख्य वैज्ञानिक ने प्रोफेसर पी बलराम तथा डॉ मुकुल दास, मुख्य वैज्ञानिक ने प्रोफेसर इंद्रनील मन्ना की उपलब्धियों के बारे में सभा को अवगत कराया।  

प्रोफेसर इंद्रनील मन्ना, निदेशक, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, कानपुर ने सभा की अध्यक्षता की। उन्होंने कहा कि शोध की सफलता सुनिश्चित करने के लिए समय की मांग है कि विज्ञान, इंजीनियरिंग और प्रौद्योगिकी के बीच सही तालमेल हो। उन्होंने वैज्ञानिकों और प्रौद्योगिकीविदों से आग्रह किया और कहा कि सफल प्रौद्योगिकी हस्तांतरण प्राप्त करने के लिए कड़ी मेहनत की आवश्यकता है। उन्होने यह भी कहा कि इस दिशा में कार्य करने के लिए भारत सरकार में हाल ही में इंप्रिंट नामक एक कार्यक्रम शुरू किया है जिसका मुख्य उदेश्य  देश को विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में  सफल एवं सक्षम बनाना और समावेशी विकास और आत्मनिर्भरता प्रदान करना है।

इस अवसर पर संस्थान के पर्यावरण निगरानी विभाग द्वारा तैयार “लखनऊ शहर के परिवेश वायु गुणवत्ता का आकलन: एक सर्वेक्षण के निष्कर्ष" पूर्व मानसून, 2016 रिपोर्ट संस्थान की वेबसाइट पर जारी की गयी ।

सीएसआईआर–आईआईटीआर द्वारा विद्यालय के छात्रों के लिए “वन्य जीवों का अवैध व्यापार” विषय पर दो आयु वर्गों  में एक चित्रकला प्रतियोगिता का आयोजन भी किया गया था, जिसके लिए पुरस्कार इस अवसर पर वितरित किए गए। कार्यक्रम ई॰ ए एच खान, प्रधान वैज्ञानिक, सीएसआईआर-आईआईटीआर और समारोह के संयोजक द्वारा धन्यवाद ज्ञापन के साथ समाप्त हुआ।

सीएसआईआर-आईआईटीआर में 11 मई, 2016 को राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी दिवस का आयोजन किया गया। इस अवसर पर डॉ एसपीएस खनूजा, पूर्व निदेशक, सीएसआईआर-सीमैप और संस्थापक और संरक्षक स्काइस लाइफ टेक्नोलॉजीज प्राइवेट लिमिटेड को प्रौद्योगिकी दिवस व्याख्यान देने के लिए आमंत्रित किया गया। प्रोफेसर आलोक धवन, निदेशक, सीएसआईआर-आईआईटीआर ने बहुत ही गर्मजोशी से उनका स्वागत करते हुए इस दिन के महत्व पर जोर दिया और बताया कि क्यों यह दिन हर वर्ष  मनाया जाता है।

 

अपने व्याख्यान "रीचिंग द अनरीच्ड: इनोवेशन पाथ आफ साइंस” में डा खनूजा ने वनस्पति आनुवंशिकीविद् और आणविक जीवविज्ञानी से प्रारम्भ कर एक अन्वेषक और उद्यमी के रूप में अपनी यात्रा का वृतांत दर्शकों के समक्ष प्रस्तुत किया।  

 

डॉ खनूजा ने वैज्ञानिकों से प्रयोगशाला से उद्योग का पथ चुनने के बजाय उद्योग के लिए प्रयोगशाला का पथ चुनने के लिए आग्रह किया। उन्होंने कहा कि पौधे माध्यमिक चयापचयों का प्रयोग करके एक अनूठी व्यवस्था द्वारा आपस में संवाद करते हैं और हम वैज्ञानिक इन अणुओं का दोहन विभिन्न अनुप्रयोगों द्वारा समाज के लाभ के लिए कर सकते हैं।  उन्होंने 1996 में सीमैप में रहते हुए अपने स्वयं के उदाहरण का हवाला दिया जिससे मिंट में तेल की मात्रा में वृद्धि तथा बेहतर प्रक्रिया द्वारा भारत चीन से अग्रणी हो गया और कई किसानों के लिए आजीविका का साधन बना। उन्होंने एक और सफलता की कहानी आर्टीमिसिनिन का वर्णन किया जो एक मलेरिया रोधी दवा के रूप में 42 देशों को निर्यात किया जा रहा है। उन्होने बताया कि 2008 से एक उद्यमी के रूप में उच्च पोषक खाद्य पदार्थों का उत्पादन प्रारम्भ किया एवं जन मानस तक पहुंचाया। डॉ खनूजा ने श्रोताओं को बताया कि प्रौद्योगिकी व्यवहार्य बनाने के लिए तीन अत्यावश्यक चरण अर्थात नो-हाउ, शो-हाउ डू-हाउ आवश्यक हैं।

 

अपने व्याख्यान के समापन में डॉ खनूजा ने एक सफल उद्यमी बनने के लिए इच्छाशक्ति, कौशल और लक्ष्य पर बल दिया ।

 

डॉ डी कार चौधरी, मुख्य वैज्ञानिक ने धन्यवाद प्रस्ताव दिया।


मानव म्यूटेशन के कैटलॉगिग की सुविधा, अनुवांशिक इंजीनियर्ड जंतु मॉडल और जीनोमिक विज्ञान मे तेजी से हुए विकास के उपयोग द्वारा बुनियादी शोध का चिकित्सीय शोध के परिणामों पर प्रभावी असर पड़ा है।  इस तथ्य को प्रोफेसर मोने जैदी एमडी, पीएचडी, FRCP, FRCPI, एफआरसी पैथ और मेडिसिन और स्ट्रक्चरल और रासायनिक जीव विज्ञान के प्रोफेसर, माउंट सिनाई स्कूल ऑफ मेडिसिन,  न्यूयॉर्क के द्वारा समझाया गया।  वे सीएसआईआर-आईआईटीआर स्‍वर्ण जयंती व्‍याख्‍यान की कड़ी में संस्थान में राष्‍ट्रीय विज्ञान दिवस समारोह के दौरान  व्याख्यान दे रहे थे।  ऑस्टियोपोरोसिस, सार्वजनिक स्वास्थ्य के महत्व की एक गंभीर बीमारी का उदाहरण देते हुए प्रोफेसर मोने जैदी ने बताया कि कैसे नई चिकित्सकीय लक्ष्यों की खोजो ने रोग के नैदानिक ​​प्रबंधन में सुधार के उपयोग के लिए प्रेरित किया है।  पिट्यूटरी अंत: स्रावी ग्रंथि के हार्मोन का हड्डी पर सीधे प्रभाव की नई भूमिका की चर्चा हुई।

 

प्रोफेसर जैदी ने बहुत ही सरल और स्पष्ट भाषा में दवाओं की खोज में एक नई अवधारणा को बताया, अर्थात नए प्रयोग के लिए पुरानी दवाओं को पुन: किसी नये प्रयोग में लाना है।  मानार्थ, जीनोमिक, कम्प्यूटेशनल, बॉयोफिजिकल और माउस आधारित प्रौद्योगिकियों से डाटा से पता चला है, कि कैसे बिसफ़ॉस्फ़ोनेट्स, ऑस्टियोपोरोसिस के लिए आमतौर पर इस्तेमाल की जाने वाली  दवा को कैंसर के कुछ प्रकार के उपचार में निर्देशित किया जा सकता है।

 

इससे पहले, सभी का स्वागत करते हुए, प्रोफेसर आलोक धावन, निदेशक, सीएसआईआर – भारतीय विषविज्ञान अनुसंधान संस्‍थान ने कहा, कि यह वास्तव में भारतीय विज्ञान की सफलता और संस्थान के अपने स्वर्ण जयंती का जश्न पांच पीढ़ियों के वैज्ञानिकों के साथ मनाने का एक ऐतिहासिक अवसर है।

 

अपने अध्यक्षीय संबोधन में पद्मश्री डॉ. नित्या आनंद, भूतपूर्व निदेशक, सीएसआईआर –केंद्रीय औषधि अनुसंधान संस्‍थान, ने वैज्ञानिक संस्थानों के बीच अधिक से अधिक तालमेल के महत्व पर बल दिया।  भारतीय विज्ञान पारंपरिक दवाओं और तरीकों का एक समृद्ध भंडार है और समय की मांग है कि ट्रांसलेशनल  अनुसंधान के लिए संसाधनो का दोहन किया जाना चाहिए।

 

सम्‍माननीय अतिथि पद्मश्री, प्रोफेसर रवि कांत, वाइस चांसलर , किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय ने कहा कि प्रयोगशाला के अनुसंधान को रोगियों तक प्रभावी हस्तांतरण में कोई अवरोध नहीं होना चाहिए।

 

डॉ. पूनम कक्कड़, अध्‍यक्ष, राष्ट्रीय विज्ञान दिवस समारोह समिति ने वक्ता का परिचय दिया और डॉ. एन. मणिक्‍कम, समिति के संयोजक ने  धन्यवाद ज्ञापित किया।

 

संस्थान ने अत्याधुनिक विज्ञान का अनुभव करने के लिए आम नागरिकों हेतु खुला दिवस (ओपन डे) आयोजित किया गया।   शहर के पाँच विश्वविद्यालयों से स्नातक छात्रों को संस्थान की प्रयोगशालाओं का दौरा करने और वैज्ञानिक कर्मचारियों के साथ बातचीत करने के लिए आमंत्रित किया गया।  प्रोफेसर आलोक धावन ने बुनियादी अनुसंधान को प्राप्त करने की प्रासंगिकता और अत्‍याधुनिक टेक्‍नोलॉजी की खोज पर बल दिया।

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