हमारे कार्यक्रम

सीएसआईआर-भारतीय विषविज्ञान अनुसंधान संस्थान में पर्यावरण दिवस समारोह मनाया गया इस  अवसर पर  भारत के वरिष्ठ एवं प्रतिष्ठित वैज्ञानिक एकत्र हुए । शहर स्थित  सीएसआईआर-भारतीय विषविज्ञान अनुसंधान संस्थान में विज्ञान और प्रौद्योगिकी का उल्लेखनीय यथार्थ मिश्रण पर्यावरण दिवस समारोह में दिखा । संस्थान के निदेशक प्रोफ़ेसर  आलोक धावन ने कहा कि पद्मश्री प्रोफेसर डी. बालासुब्रामनियन, पूर्व निदेशक, सीएसआईआर- कोशिकीय एवं आणविक जीवविज्ञान केंद्र, (सीसीएमबी) हैदराबाद एवं प्रतिष्ठित वैज्ञानिक, एल.वी. प्रसाद नेत्र संस्थान,  हैदराबाद और पद्मश्री डॉ. नित्या आनंद, पूर्व निदेशक, सीएसआईआर-केंद्रीय औषधि अनुसंधान संस्थान (सीडीआरआई), लखनऊ की इस अवसर पर उपस्थिति,  मौलिक विज्ञान को मूर्त मानव लाभ में परिवर्तित करने के लिए संस्थान की प्रतिबद्धता को दर्शाती है। इस अवसर पर  सीएसआईआर-आईआईटीआर के अनेक पूर्व एवं वर्तमान वैज्ञानिक और कर्मचारी तथा शोध छात्र उपस्थित थे।

प्रोफेसर डी. बालासुब्रामनियन ने सभी से अनुरोध किया कि हरित बनाने और पर्यावरण के संरक्षण के  लिए वैकल्पिक ईंधन के संसाधनों का उपयोग करें ।

पद्मश्री प्रोफेसर डी. बालासुब्रामनियन ने इस अवसर  पर 21वॉं डॉ. सी.आर. कृष्णाुमूर्ति व्याूख्यान दिया। ग्लोबल वार्मिंग पर प्रकाश डालते हुए, उन्होंने जीवाश्म ईंधनों (फॉसिल फ़्यूल्स ) को त्यागने की आवश्यकता पर बल दिया, ताकि भावी विश्व स्वच्छ सुंदर हो और पर्यावरण को संजोए रखा जा सके । प्रोफेसर डी. बालासुब्रामनियन ने कहा कि इस समय नितांत आवश्यक है कि सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, ज्वारीय ऊर्जा और माइक्रोबियल ईंधन कोशिकाओं से बायोइलेक्ट्रीसिटी जैसे वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों का उपयोग करके पर्यावरण के अनुकूल रहें ।

समारोह की अध्योक्षता डॉ. नित्याो आनन्दि, पूर्व निदेशक, सीएसआईआर-केंद्रीय औषधि अनुसंधान संस्थान(सीडीआरआई), लखनऊ ने की।  उन्होंने अपने सम्बोधन में कहा कि पर्यावरण सबसे पवित्र वस्तु है, जिससे जीवन का अस्तित्व सुविधाजनक बनता है और इसलिए इसे संरक्षित करने की आवश्यकता है। उन्होंने सुझाव दिया कि स्कूलों और कॉलेजों को पर्यावरण विज्ञान पर एक नियमित  पाठ्यक्रम रखना चाहिए । उन्होंने सभी से वातावरण को सुरक्षित बनाने के लिए कार्य करने हेतु प्रतिज्ञा  करने के लिए भी अनुरोध किया।

संस्थान के पर्यावरण निगरानी विभाग द्वारा तैयार की गई एक रिपोर्ट, "प्री मानसून, 2017 के दौरान लखनऊ शहर के परिवेश वायु गुणवत्ता का आंकलन", इस अवसर पर जारी की  गई । इस रिपोर्ट का विवरण संस्थान की वेबसाइट पर उपलब्ध है।

इसी क्रम में सीएसआईआर - आईआईटीआर ने दो आयु समूहों में स्कूल के छात्रों के लिए एक पेंटिंग प्रतियोगिता आयोजित  की गई,  जिसके विजयी प्रतिभागियों को  इस अवसर पर पुरस्कारों का वितरण किया गया। ई॰ ए.एच. खान, प्रधान  वैज्ञानिक, सीएसआईआर-आईआईटीआर एवं  समारोह के संयोजक के  धन्यवाद ज्ञापन के  साथ कार्यक्रम संपन्न हुआ ।

सीएसआईआर - भारतीय विषविज्ञान अनुसंधान संस्थान (सीएसआईआर - आईआईटीआर), लखनऊ में दिनांक 14-11-2016 को स्वर्ण जयंती वार्षिक दिवस समारोह का आयोजन किया गया । इस अवसर पर मुख्‍य अतिथि, श्री राम नाईक, माननीय राज्यपाल, उत्तर प्रदेश थे। सर्व प्रथम राष्ट्रगीत, वंदे मातरम...और उसके बाद सीएसआईआर-आईआईटीआर कुल गीत, जिनके हाथ किया करते हैं सदा देश निर्माण, उन मेहनतकश मज़दूरों के लिए करना है कुछ काम..... का  गायन हुआ।  तदुपरांत प्रोफेसर आलोक धावन, निदेशक, सीएसआईआर-आईआईटीआर ने तुलसी का पौधा  और प्रतीक चिह्न प्रदान कर मुख्य अतिथि माननीय राज्‍यपाल को सम्मानित किया । डॉ. देवेन्‍द्र परमार, मुख्य वैज्ञानिक, सीएसआईआर-आईआईटीआर ने अतिथियों का परिचय दिया और कहा  कि यह मेरे लिए अत्यंत हर्ष का विषय है कि मुझे महान विभूतियों का परिचय  देने का अवसर मिला है  ।

राष्‍ट्रगीत के पश्‍चात् माननीय राज्‍यपाल ने दीप प्रज्‍ज्‍वलित कर स्वर्ण जयंती वार्षिक दिवस समारोह का उद्घाटन किया एवं संस्‍थान के निदेशक द्वारा लिखित पुस्तक कोमेट एसे का विमोचन किया।  साथ ही संस्थान के वार्षिक प्रतिवेदन, पर्यावरण रिपोर्ट और वेबसाइट का भी विमोचन किया । माननीय राज्यपाल ने संस्थान के पाँच कर्मियों को भी पुरस्कृत किया

मुख्य अतिथि श्री राम नाईक, माननीय राज्यपाल, उत्तर प्रदेश ने  संबोधन  में कहा कि कोई भी वर्ष या संस्‍थान अपना वार्षिक दिवस मनाता है तो निश्चित तौर पर वह सुख , आनन्‍द का दिवस होता है और जब पहले 25वें वर्ष पर  सिल्‍वर जुबली और 50वें वर्ष पर  गोल्‍डेन जुबली दिवस मनाते हैं तो  निश्चित तौर पर इसका संस्‍थान के इतिहास में एक महत्‍व है, और यह संस्‍थान के लिए ऐतिहासिक दिवस है।  आज की परिस्थिति में भारत और विश्‍व के लिए आप जिस प्रकार से कार्य कर रहे हैं, वह अतुलनीय और निश्चित ही अभिनन्‍दनीय है।  आज के दिन की और भी एक बड़ी विशेषता है।  इसको कहते हैं सुखद संयोग।  आज देश के पहले प्रधानमंत्री श्री पंडित जवाहर लाल नेहरू का जन्‍म दिवस भी है।  और देश आजाद होने के बाद देश के प्रगति में उन्‍होंने विज्ञान का महत्‍व सामने रखकर कई कार्य प्रारंभ किए थे। आज दुनिया के मंच पर भारत भी वैज्ञानिक विकास की दृष्टि से काफी आगे बढ़ा है।  यह वैज्ञानिक प्रेरणा नेहरू जी ने देश को दिया था। उनको भी मैं आज के दिन याद करता हूँ और नमन भी करता हूँ।  आपके संस्‍थान का यह वॉं दिन निश्चिय ही सुख एवं आनन्‍द50 कारक है, मैं आप सभी को शुभकामनाएं और अभिनन्‍दन देता हॅूं।  आपके संस्‍थान का ‘’बोध वाक्‍य : पर्यावरण स्‍वास्‍थ्‍यकी सुरक्षा तथा उद्योग की सेवा है।‘’ जो सरहनीय है । 50 वर्ष में जो वैज्ञानिक कार्य हुए हैं, वह किस प्रकार हुए हैं, उसका विचार करना चाहिए और अगले 50 वर्ष में जो इससे बेहतर कार्य करने है, उन पर विचार करने की आवश्‍यकता है। यहॉं की रिपोर्ट बताती है कि जो भी कार्य हुए हैं, वे बहुत महत्‍वपूर्ण हैं।

प्रोफेसर आलोक धावन, निदेशक, सीएसआईआर-आईआईटीआर ने अतिथियों  का स्वागत किया और  वार्षिक प्रतिवेदन  प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि सार्वजनिक वित्तपोषित यह एक मात्र संस्थान है जो विषविज्ञान के क्षेत्र में कार्यरत है । विषविज्ञान के क्षेत्र में संस्थान अग्रणी है । सीएसआईआर-आईआईटीआर ने 50वें वर्ष के दौरान उच्च इम्पैक्ट फैक्टर वाले अनेक  शोध पत्र प्रकाशित किया है और 3.331 औसत इम्पैक्ट फैक्टर वाले 142 शोध पत्र विशेषज्ञ समीक्षित जर्नलों (पी रिवियुव्ड जर्नल्स)में प्रकाशित किया है, जो संस्थान के वैज्ञानिकों द्वारा किए जा रहे समसामयिक अनुसंधान के उच्च स्तर का संकेत है सीएसआईआर-आईआईटीआर, सीएसआईआर में एक मात्र और सरकारी क्षेत्र में दूसरी, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त और जीएलपी प्रमाणित प्रयोगशाला है ।  रसायन/फार्मूलेशन, , कीटनाशकों, औषधि, कॉस्मेटिक उत्पादों , खाद्य उत्पादों और फ़ीड एडिटिव्स हेतु आईआईटीआर  में जीएलपी परीक्षण सुविधा के माध्यम से तैयार  विषाक्तता /जैव-सुरक्षा डाटा सभी 34 सदस्य देशों  और 58 संबद्ध  गैर-सदस्य देशों में नियामक प्राधिकरणों की तरह ही  स्वीकार्य होता हैं  । उन्होने कहा कि संस्थान के इस  स्वर्ण जयंती वार्षिक दिवस समारोह का इंटरनेट के माध्यम से भारत सहित संपूर्ण विश्व में सीधे प्रसारण हो रहा है ।

 प्रोफेसर ब्रायन कैंटर, कुलपति, ब्रैडफोर्ड विश्वविद्यालय, यूनाइटेड किंगडम ने वार्षिक दिवस संबोधन  में कहा कि विषविज्ञान के क्षेत्र में कार्य हेतु इस संस्थान की स्थापना 1965 में हुई थी । विषविज्ञान और पर्यावरण की सुरक्षा तथा उद्योग की सेवा के क्षेत्र में इस संस्थान द्वारा किए गए कार्य विशेष रूप से सराहनीय हैं । शानदार सफलता और गौरवशाली 50 वर्ष की पूर्णता पर उन्होने संस्थान के निदेशक, वैज्ञानिकों और सभी कर्मियों को बधाई दिया । इस अवसर पर सीएसआईआर-आईआईटीआर,लखनऊ एवं ब्रैडफोर्ड विश्वविद्यालय, यूनाइटेड किंगडम के मध्य एक समझौता ज्ञापन पर हताक्षर भी हुए । इस अवसर पर  प्रोफेसर डायना एंडरसन, ब्रैडफोर्ड विश्वविद्यालय, यू.के.भी उपस्थित रहीं ।

इस से पूर्व प्रोफेसर ब्रायन कैंटर, कुलपति, ब्रैडफोर्ड विश्वविद्यालय, यूनाइटेड किंगडम ने प्रातः 10:30 बजे, संस्थान के सभागार में  बीसवाँ एस.एच. ज़ैदी व्याख्यान हाई एन्ट्रापी एलायज़ – द डेवेलपमेंट ऑफ न्‍यू मटीरिअल्स'' विषय पर दिया।

 

राष्ट्रगान के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ और डॉ. डी. कार चौधुरी, मुख्य वैज्ञानिक एवं अध्यक्ष आयोजन समिति ने धन्यवाद ज्ञपित किया ।

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सीएसआईआर-भारतीय विषविज्ञान अनुसंधान संस्‍थान में हिंदी सप्‍ताह 2016 के उद्घाटन समारोह का आयोजन

सीएसआईआर-भारतीय विषविज्ञान अनुसंधान संस्थान, लखनऊ में आज दिनांक 14 सितंबर  को एस.एच. जैदी सभागार में हिंदी सप्तांह के उद्घाटन समारोह का आयोजन किया गया। समारोह के मुख्य अतिथि श्री अनिल कुमार लाहोटी, मंडल रेल प्रबंधक, उत्तसर रेलवे, लखनऊ थे। इस अवसर पर मुख्यट अतिथि महोदय ने कहा कि आम धारणा यह है कि वैज्ञानिक एवं तकनीकी कार्य हिंदी में करना अत्यंत दुष्कर है, विशेषकर इसलिए कि अधिकांश वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली अंग्रेजी में है, किंतु इस संस्थान में वैज्ञानिक एवं तकनीकी कार्य हिंदी में किए जा रहे हैं यह अचरज की बात है।  न केवल प्रशासनिक, वैज्ञानिक, बल्कि शोध पत्र भी हिंदी में प्रकाशित किए जा रहे हैं।  संस्थाथन की राजभाषा पत्रिका "विषविज्ञान संदेश" एक उल्लेखनीय प्रयास है। यह एक सुसंपादित वैज्ञानिक जानकारी वाली हिंदी पत्रिका है, जो अति प्रसंशनीय है, इसे अनेक पुरस्कार प्राप्त हो चुके हैं तथा यह भी स्वाभाविक है कि आगे भी इसे कई पुरस्कार प्राप्त हों। विषविज्ञान संस्थान में जिस प्रकार हिंदी में कार्य किया जा रहा है, वह अपने आप में एक उदाहरण है और हमारे लिए प्रेरणास्रोत है। संस्थाान के निदेशक, प्रोफेसर आलोक धावन, वैज्ञानिक तथा तकनीकी एवं प्रशासनिक कर्मियों के द्वारा इस संदर्भ में किए जा रहे कार्य विशेष रूप से प्रशंसनीय हैं। उन्होंने यह भी कहा कि हमारे माननीय प्रधानमंत्री जी विदेश यात्राओं के दौरान अपने भाषण में हिंदी का अधिक से अधिक प्रयोग करते हैं, हम सभी को इससे प्रेरणा लेनी चाहिए। 

समारोह की अध्यक्षता संस्थान के निदेशक, प्रोफेसर आलोक धावन ने किया।  उन्होंने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा कि मैं सर्वप्रथम यह कहना चाहूँगा कि हिंदी सप्ताह के दौरान हमें विचार करना चाहिए कि कैसे हम अपनी राजभाषा हिंदी को आगे ले जा सकते हैं और पूरे वर्ष कैसे अधिक से अधिक इसका प्रयोग कर सकते हैं। इसके कार्यान्वयन हेतु पूरे वर्ष की योजना बना लेनी चाहिए। विज्ञान को आगे ले जाने हेतु भाषा एक सशक्त माध्यम है।  अंग्रेजी भाषा में शब्द सीमित हैं, वहीं हिंदी के पास विस्तृत शब्द भण्डार है, वैज्ञानिक और तकनीकी कार्य इसमें आसानी से किए जा सकते हैं।  उन्होंने यह भी कहा कि मैं सरलता से हिंदी लिख लेता हूँ, जब कि मैंने अंग्रेजी माध्यम में शिक्षा प्राप्त किया है।  हम अपनी राजभाषा को कैसे आगे ले जाएं, यह सोच हम सभी के अंदर होनी चाहिए। 

संस्थाीन के प्रशासन नियंत्रक, श्री अनिल कुमार ने बताया कि हिंदी सप्तााह के दौरान अनेक प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जाता है। इसमें वैज्ञानिक, तकनीकी एवं प्रशासनिक अधिकारी, कर्मचारी, शोध-छात्र बढ़-चढ़कर भाग लेते है। कार्यक्रम का संचालन हिंदी अधिकारी, श्री चन्द्री मोहन तिवारी ने किया। 

 हिंदी सप्ताह 2016 के पुरस्‍कार वितरण एवं समापन समारोह का आयोजन

सीएसआईआर-भारतीय विषविज्ञान अनुसंधान संस्थान (आईआईटीआर), लखनऊ में आज दिनांक 20 सितंबर, 2016 को एस.एच. जैदी सभागार में हिंदी सप्ताह पुरस्कार वितरण एवं समापन समारोह का आयोजन किया गया।  समारोह के मुख्यक अतिथि डॉ. ए.डी. पाठक, निदेशक, भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान, लखनऊ थे। प्रोफेसर आलोक धावन, निदेशक, आईआईटीआर ने मुख्य अतिथि महोदय का स्वागत करते हुए कहा कि डॉ. पाठक राजभाषा कार्यान्वयन में आने वाली समस्याओं का निराकरण बड़ी आसानी से कर देते हैं।  हिंदी अधिकारी श्री चन्द्र मोहन तिवारी ने मुख्य अतिथि महोदय का परिचय देते हुए कहा कि आप गन्ना संस्थान के निदेशक के साथ-साथ नगर राजभाषा कार्यान्वययन समिति (नराकास), कार्यालय-3 के अध्यक्ष भी हैं, और हिंदी में आपका सराहनीय योगदान है। इस अवसर पर मुख्या अतिथि महोदय ने कहा कि भारतीय विषविज्ञान अनुसंधान संस्थान का हिंदी के उत्थान में विशेष योगदान रहा है, संस्थान की राजभाषा पत्रिका ‘’विषविज्ञान संदेश’’ एक उल्ले‍खनीय प्रयास है। यह एक सुसंपादित वैज्ञानिक जानकारी वाली हिंदी पत्रिका है, जो अति प्रसंशनीय है, इसे अनेक पुरस्कार प्राप्त हो चुके हैं। आईआईटीआर में जिस प्रकार हिंदी में कार्य किया जा रहा है, वह अपने आप में एक उदाहरण है और हमारे लिए प्रेरणास्रोत है तथा ऐसे सराहनीय कार्य के लिए मैं नगर राजभाषा कार्यान्वयन समिति की ओर से आईआईटीआर के निदेशक और वैज्ञानिक, तकनीकी तथा प्रशासनिक कर्मियों को बधाई देता हूँ। 

हिंदी सप्ताुह के दौरान हिंदी टंकण, प्रश्नोदत्तिरी (क्विज), वाद-विवाद, आशुभाषण, हिंदीतर भाषी का हिंदी ज्ञान, अनुवाद, लेख और टिप्प‍ण व मसौदा लेखन प्रतियोगिताएं आयोजित की गईं। समारोह में मुख्य अतिथि द्वारा प्रतियोगिता में विजयी प्रतिभागियों को प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय पुरस्कार और प्रमाणपत्र प्रदान किये गए। इसके अलावा वर्ष के दौरान हिंदी में कार्य करने की प्रोत्सााहन योजना के अंतर्गत विजयी प्रतिभागियों को पुरस्का‍र और प्रमाणपत्र प्रदान किये गए। कार्यक्रम का संचालन हिंदी अधिकारी, श्री चन्द्रत मोहन तिवारी ने किया। 

श्री अनिल कुमार, प्रशासन नियंत्रक ने धन्यरवाद ज्ञापित किया। 

पद्मश्री प्रोफेसर डी. बालासुब्रामनियन, पूर्व निदेशक, सीएसआईआर- कोशिकीय एवं आणविक जीवविज्ञान केंद्र,(सीसीएमबी) हैदराबाद एवं प्रतिष्ठित वैज्ञानिक, एल.वी. प्रसाद नेत्र संस्थान,  हैदराबाद ने 21वॉं डॉ. सी.आर. कृष्णािमूर्ति व्याशख्याएन दिया। ग्लोबल वार्मिंग पर प्रकाश डालते हुए, उन्होंने जीवाश्म ईंधनों (फॉसिल फ़्यूल्स ) को त्यागने की आवश्यकता पर बल दिया, ताकि भावी विश्व स्वच्छ सुंदर हो और पर्यावरण को संजोए रखा जा सके । प्रोफेसर डी. बालासुब्रामनियन ने कहा कि इस समय नितांत आवश्यक है कि सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, ज्वारीय ऊर्जा और  माइक्रोबियल ईंधन कोशिकाओं से बायोइलेक्ट्रीसिटी जैसे वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों का उपयोग करके पर्यावरण के अनुकूल रहें ।

सीएसआईआर-आईआईटीआर में 11 मई, 2016 को राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी दिवस का आयोजन किया गया। इस अवसर पर डॉ एसपीएस खनूजा, पूर्व निदेशक, सीएसआईआर-सीमैप और संस्थापक और संरक्षक स्काइस लाइफ टेक्नोलॉजीज प्राइवेट लिमिटेड को प्रौद्योगिकी दिवस व्याख्यान देने के लिए आमंत्रित किया गया। प्रोफेसर आलोक धवन, निदेशक, सीएसआईआर-आईआईटीआर ने बहुत ही गर्मजोशी से उनका स्वागत करते हुए इस दिन के महत्व पर जोर दिया और बताया कि क्यों यह दिन हर वर्ष  मनाया जाता है।

 

अपने व्याख्यान "रीचिंग द अनरीच्ड: इनोवेशन पाथ आफ साइंस” में डा खनूजा ने वनस्पति आनुवंशिकीविद् और आणविक जीवविज्ञानी से प्रारम्भ कर एक अन्वेषक और उद्यमी के रूप में अपनी यात्रा का वृतांत दर्शकों के समक्ष प्रस्तुत किया।  

 

डॉ खनूजा ने वैज्ञानिकों से प्रयोगशाला से उद्योग का पथ चुनने के बजाय उद्योग के लिए प्रयोगशाला का पथ चुनने के लिए आग्रह किया। उन्होंने कहा कि पौधे माध्यमिक चयापचयों का प्रयोग करके एक अनूठी व्यवस्था द्वारा आपस में संवाद करते हैं और हम वैज्ञानिक इन अणुओं का दोहन विभिन्न अनुप्रयोगों द्वारा समाज के लाभ के लिए कर सकते हैं।  उन्होंने 1996 में सीमैप में रहते हुए अपने स्वयं के उदाहरण का हवाला दिया जिससे मिंट में तेल की मात्रा में वृद्धि तथा बेहतर प्रक्रिया द्वारा भारत चीन से अग्रणी हो गया और कई किसानों के लिए आजीविका का साधन बना। उन्होंने एक और सफलता की कहानी आर्टीमिसिनिन का वर्णन किया जो एक मलेरिया रोधी दवा के रूप में 42 देशों को निर्यात किया जा रहा है। उन्होने बताया कि 2008 से एक उद्यमी के रूप में उच्च पोषक खाद्य पदार्थों का उत्पादन प्रारम्भ किया एवं जन मानस तक पहुंचाया। डॉ खनूजा ने श्रोताओं को बताया कि प्रौद्योगिकी व्यवहार्य बनाने के लिए तीन अत्यावश्यक चरण अर्थात नो-हाउ, शो-हाउ डू-हाउ आवश्यक हैं।

 

अपने व्याख्यान के समापन में डॉ खनूजा ने एक सफल उद्यमी बनने के लिए इच्छाशक्ति, कौशल और लक्ष्य पर बल दिया ।

 

डॉ डी कार चौधरी, मुख्य वैज्ञानिक ने धन्यवाद प्रस्ताव दिया।


जल से है जीवन, जीवन लाता है आशा और आशा कभी नहीं मरती ।


इस तथ्य को पद्म श्री चेवांग नोर्फेल द्वारा समझाया गया जो लद्दाख के "आइस मैन के नाम से  लोकप्रिय हैं। वह संस्थान में राष्ट्रीय विज्ञान दिवस समारोह के अंतर्गत एक लोकप्रिय विज्ञान व्याख्यान दे रहे थे। पद्म श्री चेवांग नोर्फेल ने जम्मू-कश्मीर राज्य में ग्रामीण विकास विभाग से सेवानिवृत्ति के बाद राज्य के लेह-लद्दाख क्षेत्र में पानी की भारी कमी को संबोधित करने का कार्य स्वयं के कंधों पर ले लिया। उन्होने इस समस्या के समाधान करने हेतु कृत्रिम हिमनद बनाने के लिए अथक काम किया। एक ऐसे क्षेत्र में जहां किसान अपने 80% कृषि जरूरतों के लिए हिमनदों के जल पर निर्भर हैं, कृत्रिम हिमनद उनके लिए एक वरदान हैं।


इससे पहले, सभा का स्वागत करते हुए, डॉ के सी खुल्बे, वरिष्ठ प्रधान वैज्ञानिक ने राष्ट्रीय विज्ञान दिवस समारोह की उत्पत्ति का वर्णन करते हुए बताया कि यह दिवस सर सी वी रमन द्वारा रमन प्रभाव की खोज को चिह्नित करने के लिए मनाया जाता है


अपने अध्यक्षीय भाषण में प्रोफेसर आलोक धवन, निदेशक, सीएसआईआर- भारतीय विषविज्ञान अनुसंधान संस्थान, ने प्रत्येक व्यक्ति को अपने विचार में विश्वास रखने और उसी को पूरा करने की दिशा में काम करने पर बल दिया और बताया कि यह सिद्धान्त पद्म श्री चेवांग नोर्फेल द्वारा बहुत ही अच्छे ढंग से प्रदर्शित किया गया है। उन्होंने कहा कि सीएसआईआर – आईआईटीआर को इस विज्ञान दिवस के अवसर पर  श्री नोर्फेल की मेजबानी करने का गौरव प्राप्त हुआ है।


यह दिवस संस्थान में एक खुले दिवस के रूप में मनाया गया, जिस दिन आम नागरिकों के लिए संस्थान के द्वार अत्याधुनिक विज्ञान अनुभव करने के लिए खुले रहे। इस अवसर पर संस्थान द्वारा विकसित प्रौद्योगिकियों और सेवाओं की एक प्रदर्शनी भी आयोजित की गई। शहर आधारित कॉलेजों/ विश्वविद्यालयों के 200 से अधिक स्नातक एवं स्नातकोत्तर छात्रों को संस्थान की प्रयोगशालाओं का दौरा करने और वैज्ञानिक कर्मचारियों के साथ बातचीत करने के लिए आमंत्रित किया गया।


डॉ डी कार चौधरी, अध्यक्ष, राष्ट्रीय विज्ञान दिवस समारोह समिति ने वक्ता का परिचय दिया और डॉ एन मानिकम, समिति के संयोजक ने धन्यवाद प्रस्ताव दिया

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