हमारे कार्यक्रम

हिंदी सप्ताह - 2020 का उद्घाटन समारोह

सी.एस.आई.आर.-भारतीय विषविज्ञान अनुसंधान संस्थान, लखनऊ में दिनांक 14 सितंबर, 2020 को हिंदी सप्ताह का ऑनलाइन उद्घाटन समारोह का आयोजन किया गया। इस अवसर पर संस्थान के निदेशक, प्रोफेसर आलोक धावन ने सभी वैज्ञानिक, तकनीकी और प्रशासनिक स्टाफ एवं शोध छात्रों को संबोधित करते हुए कहा कि आज का दिन बहुत महत्वपूर्ण है। 14 सितंबर, 1949 को हिंदी को संघ की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया गया था। राजभाषा हिंदी बहुत समृद्ध एवं सशक्त भाषा है। सभी बैठकों, वैज्ञानिक चर्चाओं, दिन-प्रतिदिन के कार्यों में अधिकतम हिंदी का प्रयोग करें। संस्थान में हो रहे वैज्ञानिक कार्यों को सरल हिंदी भाषा के माध्यम से आमजन तक पहुचाएं, जिससे कि वैज्ञानिक उपलब्धियों का लाभ आमजन को मिल सके। उन्होंने राजभाषा कार्यान्वयन के क्षेत्र में संस्थान की उल्लेखनीय उपलब्धियों के बारे में स्टाफ को अवगत कराते हुए कहा कि हमारा संस्थान  ‘क’ क्षेत्र का एकमात्र वैज्ञानिक संस्थान है, जिसे भारत सरकार, गृह मंत्रालय, राजभाषा विभाग से गृह पत्रिकाओं के लिए सर्वोच्च पुरस्कार राजभाषा कीर्ति पुरस्कार योजना वर्ष 2019-20 में ‘क’ क्षेत्र के लिए द्वितीय पुरस्कार प्राप्त हुआ है। जो ‘विषविज्ञान संदेश’ के अंक 31 और 32, वर्ष 2019-20 हेतु है। इसके लिए संपादक मंडल बधाई के पात्र हैं। इसी क्रम में भारत सरकार, गृह मंत्रालय, राजभाषा विभाग द्वारा वर्ष 2018-19 के लिए क्षेत्रीय राजभाषा पुरस्कारों के अंतर्गत 50 से अधिक स्टाफ़ की संख्या वाले लगभग तीन हज़ार कार्यालयों में उत्तर-2 क्षेत्र (उत्तर प्रदेश एवं उत्तराखंड) में “तृतीय” पुरस्कार संस्थान को दिया गया। हाल ही में भारत सरकार, गृह मंत्रालय, राजभाषा विभाग, नगर राजभाषा कार्यान्व्यन समिति, लखनऊ (कार्यालय-3) द्वारा संस्थान को राजभाषा कार्यान्वयन में कार्यालयी कार्यों हेतु प्रथम पुरस्कार और छमाही राजभाषा पत्रिका ‘’विषविज्ञान संदेश’’ के अंक-31, वर्ष-2019-20 को द्वितीय पुरस्कारर प्राप्त हुआ है। वर्ष 2018 में संस्थान के शोध कार्यों पर हिंदी में "विषविज्ञान अनुसंधान के नये आयाम" पुस्तक प्रकाशित की गई। हिंदी दिवस पर यह प्रण लेना चाहिए कि यथासंभव कार्यों में राजभाषा का प्रयोग करें। हिंदी सप्ताह 14-20 सितंबर, 2020 के दौरान निबंध, वाद-विवाद, आशुभाषण, हिंदीतर भाषी का हिंदी ज्ञान, कविता/कहानी की रचना, अनुवाद, प्रस्तुतीकरण, प्रश्नोत्तरी एवं आदर्श वाक्य सहित कुल 9 प्रतियोगिताओं में बढ़-चढ़ कर भाग लें।

हिंदी सप्ताह - 2020 का पुरस्कार वितरण एवं समापन समारोह

सी.एस.आई.आर.-भारतीय विषविज्ञान अनुसंधान संस्थान, लखनऊ में दिनांक 21 सितंबर, 2020 को हिंदी सप्ताह का ऑनलाइन पुरस्कार वितरण एवं समापन समारोह का आयोजन किया गया। इस अवसर पर संस्थान के निदेशक, प्रोफेसर आलोक धावन ने सभी वैज्ञानिक, तकनीकी और प्रशासनिक स्टाफ एवं शोध छात्रों को वेबिनार के माध्यम से संबोधित करते हुए कहा कि कोविड के दौरान अति उत्तम कार्यक्रम आयोजित किया गया है। आप लोग अधिक से अधिक कार्य राजभाषा हिंदी में करें। आप सभी के प्रयासों के फलस्वरूप एक वैज्ञानिक संस्थान होते हुए भी इस संस्थान को संपूर्ण राजभाषा कार्यान्वयन और हिंदी पत्रिका प्रकाशन के क्षेत्र में भारत सरकार, गृह मंत्रालय, राजभाषा विभाग द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर राजभाषा कीर्ति पुरस्कार, राज्य स्तर पर क्षेत्रीय राजभाषा पुरस्कार और कई बार नगर स्तर पर पुरस्कार प्राप्त हुए हैं। संस्थान में राजभाषा कार्यान्वयन के क्षेत्र में उत्तरोत्तर प्रगति हुई है। नगर राजभाषा कार्यान्वयन समिति (कार्यालय-3), लखनऊ में वर्तमान में राजभाषा कार्यान्वयन के क्षेत्र में संस्थान प्रथम स्थान पर है । हिंदी सप्ताह के दौरान आयोजित प्रतियोगिताओं में वैज्ञानिक, तकनीकी और प्रशासनिक स्टाफ एवं शोध छात्रों ने बड़ी संख्या में प्रतिभागिता की, जो राजभाषा के प्रति लगाव को दर्शाता है, भविष्य में आप सभी हिंदी प्रतियोगिताओं में अधिक से अधिक संख्या में भाग लें, इससे आपकी क्षमता और विश्वास दोनों में वृद्धि होगी। हमें मिलजुल कर राजभाषा कार्यान्वयन को निरंतर आगे बढ़ाना है।  उन्होंने आगे कहा कि आप लोग संस्थान में हो रहे वैज्ञानिक कार्यों को सरल हिंदी भाषा के माध्यम से आमजन तक पहुचाएं, जिससे कि वैज्ञानिक उपलब्धियों का लाभ आमजन को मिल सके। वर्ष 2018 में संस्थान के शोध कार्यों पर हिंदी में प्रकाशित पुस्तक "विषविज्ञान अनुसंधान के नये आयाम" एक अनूठा प्रयास है। संस्थान में विगत कई वर्षों से जनसाधारण से जुड़े विषयों पर हिंदी में अनेक राष्ट्रीय एवं अन्तरराष्ट्रीय वैज्ञानिक संगोष्ठी का नियमित आयोजन हिंदी में परस्पर संवाद का अवसर प्रदान करता है। जनसाधारण से जुड़े विषयों पर हिंदी में अनेक विवरणिकाएं एवं पुस्तकों के प्रकाशन से जनसामान्य लाभान्वित हुए हैं। संस्थान के वार्षिक प्रतिवेदन का हिंदी में प्रकाशन भी इसी दिशा में एक प्रयास है, ताकि संस्थान के अनुसंधान कार्यों की जानकारी लोगों को हिंदी में मिल सके। हमें संस्थान के सभी कार्यों में यथासंभव राजभाषा का प्रयोग करना चाहिए। हिंदी सप्तादह 14-20 सितंबर, 2020 के दौरान निबंध, वाद-विवाद, आशुभाषण, हिंदीतर भाषी का हिंदी ज्ञान, कविता/कहानी की रचना, अनुवाद, प्रस्तुतीकरण, प्रश्नोत्तारी एवं आदर्श वाक्य  सहित कुल 9 प्रतियोगिताओं में 31 पुरस्कार एवं हिंदी में कार्य करने की प्रोत्साहन योजना के अंतर्गत 11 पुरस्कार प्रदान किए गए और इसी के साथ समारोह सम्पन्न हुआ। 

प्रकृति की जैवविविधता और मानव जाति की भलाई में इसका योगदान हमारी विरासत है तथा  हमारी पीढ़ी हेतु यह अत्यावश्यक है कि हम आने वाली पीढ़ियों को भी यह विरासत दें। यद्यपि, पिछले कुछ वर्षों में, प्रकृति के सुरक्षा जाल को ब्रेकिंग पॉइंट और पारिस्थितिक तंत्र की विविधता तक बढ़ाया गया है और इससे प्राप्त होने वाले अनेक लाभ तेजी से एक खतरनाक दर से घट रहे हैं। यद्यपि, सभी समाप्त नहीं हो गए हैं और कुछ अच्छा करने के लिए अभी भी समय है। स्थानीय से लेकर वैश्विक स्तर तक के हर स्तर पर "पुनः कल्पना करना एवं निर्माण करना" समय की माँग है। यह सुनिश्चित करने के लिए कि प्रकृति को पुनर्स्थापित, संरक्षित एवं सतत प्रयुक्त किया जाता है, रूपांतरणकारी परिवर्तन आगे का तरीका है। सीएसआईआर- इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टॉक्सिकोलॉजी रिसर्च (सीएसआईआर-आईआईटीआर), लखनऊ में मनाए गए विश्व पर्यावरण दिवस समारोह में पद्म विभूषण डॉ. आर.ए. माशेलकर, एफ.आर.एस., नेशनल रिसर्च प्रोफेसर एवं पूर्व महानिदेशक, वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) द्वारा लाइव वेबिनार के माध्यम से दिए गए 24वें डॉ सी.आर. कृष्णमूर्ति मेमोरियल व्याख्यान की यह विषय वस्तु थी। उन्होंने कहा कि वर्तमान वैश्विक महामारी इस प्रकार के परिवर्तन हेतु जागृत करने के लिए एक संकेत है; तकनीकी, आर्थिक एवं  सामाजिक फ़ैक्टर्स, सभी में एक मौलिक, संपूर्ण प्रणाली का पुनर्गठन है। समारोह की अध्यक्षता करते हुए डॉ. शेखर सी. मांडे, महानिदेशक सीएसआईआर एवं सचिव, डीएसआईआर, विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय, भारत सरकार ने सीएसआईआर द्वारा कोविड-19 उपरांत के सुरक्षित विश्व हेतु सीएसआईआर द्वारा किए गए योगदान पर प्रकाश डाला। प्रोफेसर आलोक धावन, निदेशक, सीएसआईआर-आईआईटीआर ने अपने विचारों को साझा करते हुए वैज्ञानिक समुदाय से विश्व को एक बेहतर जगह बनाने के लिए अपने प्रयासों को पुनः दोगुना करने के लिए आग्रह किया। इस अवसर पर सीएसआईआर-आईआईटीआर द्वारा लखनऊ शहर की परिवेशी वायु गुणवत्ता की प्री-मानसून मूल्यांकन रिपोर्ट भी जारी की गई।

सीएसआईआर-भारतीय विषविज्ञान अनुसंधान संस्थान, देश के प्रमुख विषविज्ञान संस्थान का  55वाँ वार्षिक दिवस  04 नवंबर, 2020 को मनाया गया। कोविड-19  वैश्विक महामारी के वर्तमान परिदृश्य को देखते हुए समारोह का आयोजन एमएस टीम ऑनलाइन प्लेटफार्म के माध्यम से किया गया।

संस्थान के निदेशक प्रोफेसर आलोक धावन ने सभा का स्वागत किया तथा संस्थान की वर्ष 2019-2020 की वार्षिक रिपोर्ट प्रस्तुत की। उन्होंने इस वर्ष में संस्थान में किए गए सफल कार्यों के बारे में सभी को अवगत कराया। विशेषकर सभी पांच वर्टिकल, जिनमें सीएसआईआर सम्मिलित है, उनमें कोविड-19 के विरुद्ध संघर्ष में संस्थान के योगदान का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि 'उद्योग की सेवा' संस्थान के मूल में प्रारंभ से ही है और परिवर्तित होते समय के साथ संस्थान अब ऑर्गनोइड्स, 3डी ऑर्गन / टिशू प्रिंटिंग, मशीन लर्निंग तथा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की अत्याधुनिक नई तकनीकों पर ध्यान केंद्रित कर रहा है। उन्होंने यह भी अवगत कराया कि सीएसआईआर-आईआईटीआर, स्वच्छ भारत, स्वस्थ भारत, कुशल भारत, नमामि गंगे आदि जैसे राष्ट्रीय मिशन कार्यक्रमों में भी योगदान दे रहा है। 

इस अवसर पर सीएसआईआर-आईआईटीआर की वार्षिक रिपोर्ट एवं लखनऊ शहर की पोस्ट मानसून पर्यावरण स्थिति की रिपोर्ट भी जारी की गई। इस अवसर पर सीएसआईआर-आईआईटीआर के अनेक स्टाफ सदस्यों और सहयोगियों को संस्थान में उनकी विशिष्ट सेवा हेतु सम्मानित किया गया।

डॉ. शेखर सी. मांडे, सचिव, डीएसआईआर एवं महानिदेशक, वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर), नई दिल्ली इस समारोह के मुख्य अतिथि थे। उन्होंने संस्थान के संस्थापक निदेशक की स्मृति में 24वाँ  प्रोफेसर सिब्ते हसन जैदी व्याख्यान दिया। उन्होंने अपने संबोधन में विगत वर्षों में विभिन्न उद्योगों की आवश्यकताओं को पूरा करने में सीएसआईआर-आईआईटीआर द्वारा निभाई गई भूमिका का उल्लेख किया। उन्होंने कोविड-19 महामारी के विरुद्ध संघर्ष में सीएसआईआर के कार्यों पर प्रकाश डालते हुए फेलुदा डायग्नोस्टिक किट, फेविपिराविर एंटी वायरल टैबलेट्स, स्वस्थ वायु वेंटिलेटर, आरोग्यपथ ऐप, वैक्सीन के विकास आदि का उल्लेख किया।

डॉ. सी.एम. गुप्ता, पूर्व निदेशक, सीएसआईआर-आईएमटेक तथा सीएसआईआर-सीडीआरआई एवं विशिष्ट प्रोफेसर, इंस्टीट्यूट ऑफ बायोइनफॉरमैटिक्स एंड एप्लाइड बायोटेक्नोलॉजी, बेंगलुरु इस समारोह के सम्मानीय अतिथि थे। अपने अध्यक्षीय व्याख्यान में डॉ. सी.एम. गुप्ता ने सीएसआईआर-आईआईटीआर के साथ अपने लंबे जुड़ाव का उल्लेख किया और संस्थान द्वारा विषविज्ञान के क्षेत्र में की गई उल्लेखनीय प्रगति पर प्रसन्नता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि यह वास्तव में बहुत अच्छा है कि प्रौद्योगिकी के गहन तरीकों एवं प्रक्रियाओं के वर्तमान समय में  सीएसआईआर-आईआईटीआर ने पहले से ही अपने कार्यों में अत्याधुनिक तकनीकों का उपयोग करने के लिए व्यापक कार्य किया  है।

इससे पहले, डॉ. के.सी. खुल्बे, वरिष्ठ प्रधान वैज्ञानिक, सीएसआईआर-आईआईटीआर ने अतिथगण का परिचय दिया। समारोह के अंत में डॉ. डी. परमार, मुख्य वैज्ञानिक, सीएसआईआर-आईआईटीआर ने धन्यवाद ज्ञापित किया।

वर्तमान में दूर–दूर तक फैली हुई कोविड-19 वैश्विक महामारी के प्रकोप से संपूर्ण विश्व महाविपत्ति से जूझ रहा है। इतिहास ऐसे अनेक उदाहरणों से परिपूर्ण है कि विज्ञान ने सदियों से जीवन के अस्तित्व एवं मानक में कैसे सुधार किया है। हमारे जैसे बड़े देश में  एक अरब से अधिक लोगों का  बेहतर जीवन सुनिश्चित करने के लिए विज्ञान और प्रौद्योगिकी पर आधारित एक सुदृढ़ व्यवस्था आवश्यक है। डॉ. संजय सिंह, सीईओ, जीनोवा बायोफार्मास्युटिकल्स लिमिटेड, पुणे ने इसी प्रकार के विचारों से युक्त सीएसआईआर स्थापना दिवस व्याख्यान दिया। व्याख्यान का शीर्षक "साइंटिफिक टेम्पर इन चेंजिंग टाइम्स" था। वह सीएसआईआर-भारतीय विषविज्ञान अनुसंधान संस्थान, लखनऊ में वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद के 79वें स्थापना दिवस समारोह में व्याख्यान दे रहे थे। उन्होंने कहा कि नए ज्ञान तथा  नई क्षमता के सामने पूर्वकल्पित धारणाओं को चुनौती देने की क्षमता की खोज वैज्ञानिक प्रयासों की सफलता के लिए देश की जरूरतों को पूरा करने हेतु महत्वपूर्ण है जो आत्मनिर्भर भारत बनाने की दिशा में है। इन पंक्तियों के आधार पर, उन्होंने कहा कि जेनोवा बायोफर्मासिटिकल वर्तमान में HGC019 की ओर काम कर रहा है, COVID-19 के खिलाफ एक निवारक और सुरक्षात्मक उपाय के रूप में एक mRNA टीका है।

महामारी की स्थिति के कारण समारोह वर्चुअल मोड में हुआ। वैज्ञानिक समुदाय के कई वरिष्ठ सदस्य, जिनमें प्रोफेसर समीर के. ब्रह्मचारी, पूर्व महानिदेशक, सीएसआईआर और सीएसआईआर संस्थानों के पूर्व निदेशक डॉ वी पी कंबोज, पूर्व निदेशक, सीएसआईआर-सीडीआरआई; डॉ पी के सेठ, पूर्व निदेशक, सीएसआईआर-आईआईटीआर; डॉ. अभय देशपांडे, निदेशक, इनोवेशन और स्ट्रेटेजी जय रिसर्च फाउंडेशन; डॉ. आर सी श्रीमाल, पूर्व निदेशक, सीएसआईआर-आईआईटीआर, शामिल रहे। डॉ. एम के भट, निदेशक, एनसीसीएस पुणे ने इस अवसर पर भाग लिया।

डॉ. देवेंद्र परमार, मुख्य वैज्ञानिक, सीएसआईआर-आईआईटीआर, तथा अध्यक्ष, समारोह आयोजन समिति ने सभी का स्वागत किया और सभी को वक्ता का परिचय दिया।

प्रोफेसर आलोक धावन, निदेशक सीएसआईआर-आईआईटीआर ने समारोह की अध्यक्षता की। प्रोफेसर धावन ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में कहा कि कोविड-19 की वैश्विक महामारी के विरुध  संघर्ष में सीएसआईआर की भूमिका निदान, उपचार, अस्पताल उपकरण, आपूर्ति श्रृंखला, जीनोम अनुक्रमण आदि जैसे विभिन्न क्षेत्रों में योगदान के साथ अभूतपूर्व रही है। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि छात्र समुदाय से जुड़े अधिक कार्यक्रम करने के उपरांत सीएसआईआर प्रयोगशालाओं में ग्रीष्मकालीन प्रशिक्षण कार्यक्रम की अधिक मांग हुई है। उन्होंने कहा कि इस चुनौतीपूर्ण समय में, सीएसआईआर-आईआईटीआर ने, सीएसआईआर की  प्रयोगशालाओं के साथ मिलकर ऑनलाइन माध्यम से  75 छात्रों हेतु "समर रिसर्च ट्रेनिंग प्रोग्राम-2020" (एसआरटीपी-2020) का सफलतापूर्वक आयोजन किया।

भारत के माननीय प्रधानमंत्री, श्री नरेंद्र मोदी जी, जो सीएसआईआर सोसाइटी के अध्यक्ष भी हैं; श्री वेंकट सुब्रमण्यन, भारत के उपराष्ट्रपति; और भारत सरकार के विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्री माननीय डॉ. हर्षवर्धन ने सीएसआईआर के प्रयासों की सराहना की और पूरे सीएसआईआर परिवार को अपना आशीर्वाद दिया।

इस अवसर पर संस्थान में 25 वर्ष की सेवा पूर्ण करने वाले एवं  पिछले वर्ष सेवानिवृत्त हुए कर्मचारियों को सम्मानित किया गया। पिछले वर्ष के दौरान शिक्षा में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले सीएसआईआर-आईआईटीआर के कर्मचारियों के बच्चों को भी पुरस्कार दिए गए ।

डॉ. रवि राम कृष्टिपटि, प्रधान वैज्ञानिक, सीएसआईआर-आईआईटीआर एवं कार्यक्रम के संयोजक ने धन्यवाद ज्ञापित किया।

भारत ने 11 मई, 1998 को पोखरण में परमाणु बमों का सफलतापूर्वक परीक्षण किया था। इसी कारण प्रत्येक वर्ष 11 मई को राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी दिवस के रूप में मनाया जाता है। यह  समारोह हमारे दैनिक जीवन में प्रौद्योगिकीय नवाचारों की महत्वपूर्ण भूमिका को उजागर करते हैं और छात्रों को विज्ञान को कैरियर के रूप में अपनाने हेतु प्रोत्साहित करते हैं। यह घटना विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में हमारे वैज्ञानिकों और इंजीनियरों के महत्वपूर्ण उल्लेखनीय प्रगति पर भी प्रकाश डालती है।

सीएसआईआर-भारतीय विषविज्ञान अनुसंधान संस्थान (सीएसआईआर-आईआईटीआर), लखनऊ में सोशल नेटवर्किंग प्लेटफ़ॉर्म के माध्यम से सभी छात्रों, कर्मचारियों और वैज्ञानिकों के साथ राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी दिवस मनाया गया। प्रोफेसर आलोक धावन, निदेशक, सीएसआईआर-आईआईटीआर ने शुभारंभ संदेश में विज्ञान और प्रौद्योगिकी की उन्नति में  सीएसआईआर के योगदान पर प्रकाश डाला। प्रोफेसर थलप्पिल प्रदीप, संस्थान के प्रोफेसर और प्रोफेसर रसायन विज्ञान, रसायन विज्ञान विभाग, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, मद्रास ने प्रौद्योगिकी दिवस व्याख्यान दिया। प्रोफेसर प्रदीप आणविक सामग्री और सतह के क्षेत्र में अग्रणी हैं। वर्तमान स्थिति को ध्यान में रखते हुए, उन्होंने "महामारी के दौरान एवं उसके बाद में शैक्षणिक संस्थानों में नवाचार" शीर्षक पर आकर्षणीय व्याख्यान दिया। उन्होंने इस अवसर पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि जब हम अतीत की महामारियों को ध्यान करते हैं तो देखते हैं कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी ने सदैव  समाधान प्रदान किया है। उन्होंने कहा कि "विश्व को आज संधारणीय आजीविका, खाद्य, नई पैकेजिंग सामग्री, स्वास्थ्यकर दृष्टि से परिपूर्ण एवं स्वतः पूर्ण  घरों जैसे स्थायी समाधानों की आवश्यकता है"। इसका दूसरा पहलू यह है कि संकट की स्थिति के दौरान, मूलभूत मानवीय मूल्य मजबूत हुए हैं। लोग एकजुट हुए हैं और सामूहिकता बढ़ी है। प्रोफेसर आलोक धावन, निदेशक सीएसआईआर-आईआईटीआर ने समापन के अवसर पर छात्र समुदाय से अपने जुनून को अपने उद्देश्य में बदलने और अंततः अपने व्यवसाय में बदलने हेतु आग्रह किया। उन्होंने कहा कि भारतीय वैज्ञानिक समुदाय इस महामारी की बीमारी को समाप्त करने हेतु कठोर परिश्रम परिश्रम कर रहा है और उन्होंने आशा प्रकट किया कि सामूहिक प्रयासों से स्थिति में शीघ्र ही सुधार होगा"।

यथापूर्व स्थिति (status quo) को चुनौती दें, हमेशा पूछें कि क्यों / कैसे

यह संदेश लेफ्टिनेंट जनरल (डॉ.) बिपिन पुरी, पीवीएसएम, वीएसएम (सेवानिवृत्त), कुलपति, किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय, लखनऊ ने राष्ट्रीय विज्ञान दिवस 2021 के दौरान सीएसआईआर-भारतीय विषविज्ञान अनुसंधान संस्थान  (सीएसआईआर-आईआईटीआर) द्वारा आज आयोजित व्याख्यान में दिया।

लेफ्टिनेंट जनरल पुरी ने अपने संबोधन में कहा कि आउट ऑफ द बॉक्स सोच, एंटरप्रेन्योरिंग की पहल और कड़ी मेहनत का एक विवेकपूर्ण संयोजन ही वैज्ञानिक सफलता की कुंजी है। हमारे देश के सबसे ज्यादा प्यार पाने वाले वैज्ञानिक पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि विज्ञान मानवता के लिए एक सुंदर उपहार है और सभी को हमेशा मानव जाति की बड़ी भलाई के लिए इसका उपयोग करने का प्रयास करना चाहिए। डॉ. पुरी ने दोहराया कि हाल ही में शुरू की गई विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार नीति (एसटीआईपी) इस महान देश के वैज्ञानिक समुदाय के सफल प्रयासों की नींव रखेगी।

इससे पहले, अपने स्वागत भाषण में, सीएसआईआर-आईआईटीआर और आयोजन समिति के अध्यक्ष, मुख्य वैज्ञानिक डॉ. एन. मनिकम ने देश में विज्ञान दिवस समारोह की शुरुआत के बारे में बात की। भारत 28 फरवरी 1928 को नोबेल पुरस्कार विजेता और भारतीय भौतिक विज्ञानी सर चंद्रशेखर वेंकट रमन द्वारा रमन प्रभाव की खोज के लिए हर साल 28 फरवरी को राष्ट्रीय विज्ञान दिवस मनाता है।

अध्यक्षीय भाषण देते हुए, प्रोफेसर एस. के. बारिक, निदेशक सीएसआईआर-आईआईटीआर ने कहा कि किसी भी वैज्ञानिक खोज / आविष्कार की क्षमता का एहसास तभी होता है जब यह मानव की जरूरतों को पूरा करने और प्रगति की राह में बाधाओं को कम करने में योगदान देता है। उन्होंने वैज्ञानिक समुदाय को "आत्मनिर्भर भारत" के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अपने आप को पुनः समर्पित करने का आह्वान किया। 

डॉ. के. रवि राम, प्रमुख वैज्ञानिक, सीएसआईआर-आईआईटीआर और संयोजक, आयोजन समिति ने धन्यवाद प्रस्ताव दिया। 

थीम विकल्प चुनें
फॉन्ट साइज़ प्रीडिफ़ाइंड स्किन कलर